समाजवाद का मुखौटा* *किस्त नंबर- (3)* *मुस्तकीम मंसूरी*

मुस्तकीम मंसूरी
सत्य तो यह है कि मुलायम सिंह ने हमेशा धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सेकुलर पार्टियों एवं मुसलमानों को जितनी खूबसूरती और मक्कारी से ठगा है, इसकी मिसाल मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है, मुलायम सिंह ने 2011 में हर मंच से कहा था की हर थाने में एक मुसलमान सब इंस्पेक्टर होगा, पूरे प्रदेश में कितने थानों में सब इंस्पेक्टर दिए मुलायम ने, इस पर भी गौर करने की बात है, हां इसके विपरीत हर थाने में ही नहीं हर चौकी पर स्वजातीय सब इंस्पेक्टर से लेकर इंस्पेक्टर और सीओ जरूर देखने को मिले,

यही नहीं प्रदेश की जनता यह भी नहीं भूली है कि 2011 में मुलायम ने हर मंच से मुसलमानों को 18% आरक्षण देने का ऐलान किया था, मुसलमानों ने खुले दिल से खुलकर वोट किया, और पूर्ण बहुमत से सपा सरकार बनवाई, और सरकार बनते ही यह तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का अलंबरदार अपने किए सारे वायदे पोटली बनाकर गोमती में फेंक आया, नाही 18% आरक्षण मिला और ना ही हर थाने में सब इंस्पेक्टर, एसआई तो छोड़िए अगर समीक्षा की जाए थाने और चौकी स्तर पर तो एक सिपाही तक नजर नहीं आएगा, हां इसके विपरीत पिछली सरकारों से भी अधिक प्रदेश में भयानक संप्रदायिक दंगे अवश्य हुए, जो गुजरात दंगों से भी कहीं ज्यादा है। सच तो यह है मुलायम कभी सेकुलर रहे ही नहीं सिर्फ सोशलिज्म का चोला पहनकर सेकुलर पार्टियों एवं मुस्लिमों को धोखा देकर अपना उल्लू सीधा करते रहे, और सरकार बना कर अपने स्वजातियों को भरपूर पुलिस एवं अन्य विभागों में भर्ती करते रहे और मुसलमानों के साथ फोटो खिंचवा, खिंचवा कर खुश करते रहे, दूसरी तरफ स्वजातीय इटावा, मैनपुरी, एटा, फर्रुखाबाद से बुलाकर रात को ही शास्त्री भवन में अप्वाइंटमेंट लेटर दिए गए जिसका जीता जागता सबूत है, की पी ए सी एवं पुलिस में हर तीसरा व्यक्ति सब स्वजातीय ही मिलेगा, यह है असली समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता, जबकि बसपा और सपा गठबंधन 1993 की सरकार में शिक्षा मंत्री डॉक्टर मसूद द्वारा 5500, उर्दू अनुवादक और उर्दू शिक्षक दिए जाने से नेताजी इतने खिन्न हो गए थे, के डॉक्टर मसूद और मायावती जी के बीच बाक़ायदा तौर पर विवाद करा कर दोनों के बीच इतनी नफरत पैदा कर दी थी, कि डॉक्टर मसूद को मंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा यही नहीं रातो रात उनका सामान उठाकर बाहर फिकवाया गया, सिर्फ इसलिए कि कहीं डॉक्टर मसूद मुस्लिमों के नेता ना बन जाए, एक डॉक्टर मसूद ही नहीं मुलायम सिंह को अपनी पार्टी का वह नेता भी पसंद नहीं जिसके पीछे क़ौम के लोग हों, एक नहीं सैकड़ों लोगों की फेहरिस्त है, सच तो यह है दूसरी पार्टियों को छोड़ो खुद अपनी भी पार्टी में मुलायम ने कोई मुस्लिम नेतृत्व नहीं भरने दिया, आजम खान का नाम लेकर दूसरे मुस्लिम नेताओं को डराते रहे जब भी किसी मुस्लिम नेता ने अपनी बात रखी या कुछ मांगा नेताजी ने फौरन आजम खान का हव्वा दिखा दिया, इससे दो बातें हो गई एक तो सामने वाला डरकर खामोश हो गया इस बहाने उसको कुछ देना नहीं पड़ा दूसरे उसके दिल में आजम खान के प्रति नफरत भी पैदा हो गई, जाहिर सी बात है जो जो आजम खान साहब की वजह से सपा सरकार में कुछ नहीं पाते वह तो आजम खान के नाम से नफरत ही करेंगे, और आज उसका परिणाम भी सामने हैं, लोग बड़ी गलत फहमी में हैं, कि नेताजी समाजवादी हैं, या सैर्कुलर है, वह सिर्फ धोखे में है, नेताजी के किसी ज़माने में जितने अच्छे लालकृष्ण आडवाणी से संबंध थे उससे भी कहीं ज्यादा मधुर संबंध अमित शाह जी से हैं, वैसे भाजपा, सपा का औपचारिक गठबंधन कभी नहीं रहा, लेकिन 1990 से लेकर अब तक भाजपा के हर बुरे वक्त पर सपा ने भाजपा का साथ दिया,  एवं भाजपा की मदद की, ऐसा नहीं कि सिर्फ सपा ने ही भाजपा का साथ दिया, बल्कि बड़े लोग कभी एहसान फरामोशी नहीं करते, सूद सहित भाजपा ने भी 2004 में सपा सरकार बनवाकर मुलायम का एहसान उतार दिया, और जब से आज तक औपचारिक ना सही अनौपचारिक रूप से दोनों एक दूसरे के हर बुरे वक्त पर काम आते रहते हैं, जैसे 1999 में अटल सरकार गिराने के लिए सोनिया गांधी को दिन रात कोसने वाले मुलायम सिंह, जैसे ही सैफुद्दीन सोज के एक वोट से भाजपा सरकार गिरी फौरन मुलायम ने वही राग अलापा जो भाजपा अलाप्ती कि हम विदेशी को समर्थन नहीं दे सकते हम विदेशियों को प्रधानमंत्री नहीं बर्दाश्त कर सकते, उसके बाद चुनाव हुआ और भाजपा की मजबूत सरकार अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में बनी जो पूरे पांच साल चली, उस बीच एक मर्तबा भी इस कथित समाजवाद के अलमबरदार ने एक भी धरना प्रदर्शन भाजपा के खिलाफ नहीं किया, इसके बरअक्स उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार के विरुद्ध धरना प्रदर्शन शुरू कर लालकृष्ण आडवाणी जो मुलायम के मजबूत आदमी थे, उन से मिलकर बसपा सरकार गिरा दी, क्योंकि मुलायम सिंह जी आडवाणी जी के आदमी थे, अब अटल जी को मैनेज करने के लिए माननीय नेता जी ने अमर सिंह का इस्तेमाल किया और अमर सिंह ने उसको बखूबी निभाया और 2004 में ही मुलायम सरकार बगैर किसी बहुमत के बनी, जिस दिन बहुमत साबित होना था सारे भाजपा विधायक वाक आउट कर गए, और सपा सरकार पूरे साडे 3 वर्ष भाजपा के अप्रोक्ष सहयोग से चली, इसी बीच लोकसभा चुनाव हुए और महोदय ने अपने भाषणों में हर मंच से एक ही राग अलापा था, कि हम मुद्दों के आधार पर समर्थन देंगे और साक्षी महाराज को भी उस चुनाव में लेकर हेलीकॉप्टर से घूम रहे थे, अप्रोक्ष रूप से कल्याण सिंह का समर्थन भी हासिल, उधर साक्षी जी का साथ सर्वाधिक 38 सांसद माननीय नेता जी ने जितवा लिये, क्योंकि नेता जी हर मंच से बयान दे चुके थे हम मुद्दों के आधार पर समर्थन करेंगे, और पहले भी कह चुके थे, हम विदेशी को समर्थन नहीं करेंगे, 38 सांसद लाने के बाद भी मुलायम सिंह हतप्रभ रह गए, क्योंकि सरकार कांग्रेस बनाने के कगार पर आ गई, अब मुलायम सिंह किस मुंह से समर्थन का ऐलान करें यह कांग्रेस के पास जायें, एक मर्तबा फिर इन्होंने अमर सिंह का इस्तेमाल किया, और सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई विपक्ष की बैठक में जिसमें सपा को आमंत्रित नहीं किया गया था, बेशर्मी से भेजा जैसे ही अमर सिंह पहुंचे बेरी केटिंग पर ही रोक दिये गए, एवं अंदर नहीं जाने दिया गया।


शेष,---अगली किस्त में

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