72 साल के भेदभाव और अन्याय के विरोध और धर्म के आधार पर भेदभाव वाले अनुच्छेद 341 के विरुद्ध दिया गया धरना

 नई दिल्ली (अनवार अहमद नूर) राजधानी दिल्ली में आज अनुच्छेद 341 के ख़िलाफ़ मुस्लिम और ईसाई दलितों का संयुक्त विरोध-प्रदर्शन, काउंसिल ऑफ दलित क्रिश्चियन, जमीयत उलमा-ए-हिंद, कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया, नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज ऑफ इंडिया के नेतृत्व में  किया गया। जिसमें अनेक धार्मिक विद्वानों ने भाग लिया। कहा गया कि अनुसूचित जाति आदेश, 1950 के पैरा 3 के तहत धर्म के आधार पर ईसाईयों और मुसलमानों को अनुसूचित जातियों के अधिकारों और छूट से वंचित कर दिया गया है। यह आदेश 10 अगस्त 1950 को भारत के राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया था। यह एक धर्मनिरपेक्ष देश में घोर अन्याय और धर्म के आधार पर भेदभाव है और भारत के संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ भी है।

हालांकि इस आदेश के पैरा 3 में क्रमशः 1956 और 1990 में संशोधन किया गया ताकि अनुसूचित जाति के भीतर सिखों और बौद्धों को अनुसूचित जाति के अधिकार प्रदान किए जा सकें लेकिन फिर भी ईसाइ और मुसलमान अभी भी इससे बाहर हैं। यही कारण है कि अनुसूचित जाति के ईसाई और मुसलमान 10 अगस्त को ’ब्लैक डे’ या ’राष्ट्रीय विरोध दिवस’ के रूप में मनाते हैं। दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों के साथ इस 72 साल के भेदभाव और अन्याय के विरोध में देशभर में धरने, रैलियां और आंदोलन किए जा रहे हैं। 10 अगस्त 2022 को देशव्यापी विरोध की प्रस्तावना के रूप में, 4 अगस्त 2022 को दिल्ली में यह धरना आयोजित किया गया। जिसमें मांग की गई कि इस भेदभाव को कानून द्वारा समाप्त किया जाए और न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाए।

इस धरना में एनसीडीसी, एनसीसीआई और सीबीसीआई और जमीयत उलमा-ए-हिंद के नेताओं ने भाग लिया। इसके अलावा भारत के विभिन्न राज्यों से दलित ईसाइ और दलित मुस्लिम कार्यकर्ताओं और मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने दलित ईसाइयों और और दलित मुसलमानों के संघर्ष के साथ एकजुटता की घोषणा की ।

 इस अवसर पर  जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन क़ासमी ने कहा कि इस अन्याय के विरुद्ध जमीयत उलमा-ए-हिंद के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय मौलाना असद मदनी और मौजूदा अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने हर अवसर पर विरोध दर्ज कराया है। जमीयत के सुझावों में मूल रूप से यह शामिल है कि संविधान के अनुच्छेद 341 में संशोधन करके मुस्लिम और ईसाई दलितों को भी इसमें शामिल किया जाए। किसी भी कानून में धर्म के आधार पर किया गया भेदभाव संविधान के मूल प्रावधानों के ख़िलाफ़ है। आश्चर्य की बात यह है कि यह भेदभाव पिछले 72 सालों से किया जा रहा है। आज जब देश अपनी आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ और अमृत महोत्सव मना रहा है, इससे अधिक कोई और उचित समय नहीं हो सकता, जब इस धार्मिक भेदभाव को समाप्त किया जाए। उन्होंने कहा कि हमारे देश में सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था बिना किसी भेदभाव के हर धर्म में प्रचलित है। इसके समाप्त न होने के पीछे आर्थिक पिछड़ापन एक मुख्य कारण है। इसलिए सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह चीज़ों को धर्म के चश्मे से देखने की बजाय आर्थिक पिछड़ेपन को आधार बनाएं। कोई दलित अगर मुसलमान हो जाए या ईसाई हो तो इससे उसके आर्थिक जीवन में क्या फ़र्क पड़ता है? इसलिए इस तरह का आधार न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि लोगों के बौद्धिक विकास में भी रुकावट है।

इस अवसर पर संबोधित करने वालों में अब्दुल खालिक (बारपेटा असम), डॉ. थोल एमपी, वीजे जॉर्ज, (एनसीडीसी के अध्यक्ष), डॉ. ईडी चार्ल्स (महासचिव, एनसीडीसी), सेवानिवृत्त एमए डेनियल (बिशप, मेथोडिस्ट चर्च तेलंगाना), फादर विजय कुमार नाइक (सचिव सीबीसीसीआई कार्यालय एससी/बीसी,) निकोलस बिड़ला (सचिव कार्यालय ट्राइबल अफेयर्स सीबीसीआई), प्रदीप बंसरेवर (सचिव, दलित और आदिवासी कंसर्न एनसीसीआई), फादर एएक्सजे बॉस्को एसजे, (एनसीडीसी के सलाहकार), मेगलिन जरी (एनसीडीसी के उपाध्यक्ष), एस.एस. वागामारे और डॉ. माइकल मार्टिन (एनसीडीसी के उपाध्यक्ष) और विजय कुमार मोठकोरी (अध्यक्ष एनसीडी), सत्तारजी दलित मुस्लिम फोरम आदि रहे। उनके अलावा जमीयत उलमा-ए-हिंद से मौलाना गय्यूर अहमद क़ासमी , मौलाना अज़ीमुल्ला सिद्दीकी क़ासमी, मौलाना इस्लामुद्दीन क़ासमी, मौलाना दाऊद अमीनी, मौलाना क़ारी अब्दुस्समी, मौलाना कासिम नूरी, मौलाना जाहिद क़ासमी ने भाग लिया।

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