बाबरी मस्जिद के बाद अब ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे, मस्जिद का वुजुखाना सील करना मस्जिद में नमाजियों पर पाबंदी लगाना और बन्द पढ़ें फुब्बारे को शिवलिंग बताना ज़ुल्म और नाइंसाफी नहीं है क्या?

 बेताब समाचार एक्सप्रेस के लिए मुस्तकीम मंसूरी की रिपोर्ट, 

इंसाफ हो किस तरह कि दिल साफ नहीं है|

दिल साफ हो किस तरह की इंसाफ नहीं है| 

रामपुर,क़ाज़ि ए शरआ व मुफ्ती ए जिला रामपुर सैयद फ़ैज़ान रज़ा हसनी नूरी इरशादी ने कहा बाबरी मस्जिद के बाद अब ज्ञान वापी मस्जिद का सर्वे, मस्जिद का वुजुखाना सील कराना, मस्जिद में नमाजि़यों पर पाबंदी लगाना और बंद पडे़ फुव्वारे को शिवलिंग बताना खुली नाइंसाफी जुल्म व अत्याचार और धार्मिक नफरतों से मुल्क को जंगलराज की आग में झोंकने का वाज़ैह सुबूत है, यह दावा तो अक्ल से महरूम आदमी ही कर सकता है कि फुव्वारा शिवलिंग है, भला कोई फुव्वारा भी शिवलिंग हो सकता है,?

शिवलिंग शिवलिंग होता है और फुव्वारा फुव्वारा, दोनों में बड़ा अंतर है मुल्क की अदालतों को भी इस अंतर को अपने सामने रखना चाहिए, वरना क्या 300 साल से मुसलमान ज्ञानवापी मस्जिद की शक्ल में (खुदा की पनाह) शिवलिंग की हिफाजत कर रहे थे ताकि 300 साल बाद जब हिंदू समुदाय उसे तलाश करने आएं, तो गलत बातों और मन घड़ंत सबूतों के आधार पर अदालत को गुमराह करते हुए सोची समझी साजिश के तहत और संविधान के जरिए हुकूमत और उसके कठपुतली‌ अधिकारियों को दी गई ताकत का ग़लत इस्तेमाल करते हुए सर्वे कराए तो उसे सुबूत तलाश करने में कोई दिक्कत ना हो,

याद रहे बाबरी मस्जिद भी मस्जिद थी, मस्जिद है और कयामत तक मस्जिद रहेगी, ज्ञान वापी मस्जिद भी मस्जिद थी मस्जिद है और मस्जिद ही रहेगी, मुसलमानों ने बजा़हिर बाबरी मस्जिद खोई है। हुकूमत की पुश्तपनाही में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेकर किसी भी मस्जिद को मंदिर साबित करने की कोशिश इतिहासिक सच्चाईयों को कुचलना और कानून की खुली खिलाफ वरजी़ है!

1973 ईस्वी में कोर्ट ने सबूतों और दस्तावेज़ात की रोशनी में यह बात तय कर दी थी कि ज्ञानवापी मस्जिद का पूरा कम्पाउंड मुस्लिम वक्फ की धरोहर है और मुसलमानों को उसमें नमाज पढ़ने का पूरा पूरा हक है, लेकिन अब हिंदू समुदाय की तरफ से उसके वकील हरिशंकर जैन ने कोर्ट में एक अर्जी दाखिल कर डाली जिसमें वुजु खाने को सील करने के साथ वाराणसी के डी एम को हुकमनामा जारी करने की अपील की है कि डीएम फौरन मस्जिद में मुसलमानों के दाखिले पर पाबंदी लगाए और मस्जिद में सिर्फ 20 लोगों को ही नमाज पढ़ने की इजाजत दे, और हैरत है कि कोर्ट ने भी मुस्लिम समुदाय को सुने बगैर हिंदू समुदाय की अर्जी को हर्फ ब हर्फ  मानते हुए वैसा ही ऑर्डर जारी कर दिया, अब यहां सवाल यह पैदा होता है कि आखिर यह किस का फैसला समझा जाए कोर्ट का या फिर हिंदू समुदाय का, फैसले का अर्जी के मुवाफिक़ होना तो यही जाहिर करता है कि यहां मुंह कोर्ट का है मगर उसमें जबान हिंदू समुदाय की है!

       यह बात ज़हन में रहे कि मुसलमान ने आज तक किसी मंदिर के बारे में यह दावा नहीं किया है के यहां हमारी मस्जिद थी और ना ही कभी झूठे दस्तावेज तैयार किए, जबकि वह चाहे तो तिर्मीजी़ शरीफ की हदीस ए पाक के"पूरी जमीन (मुसलमानों के) नबी के लिए मस्जिद बनाई गई है" के मुताबिक यह दावा कर सकता है कि "हर मंदिर मस्जिद की जगह पर कायम है" फिर अगर मुसलमान यह दावा करने पर आ जाए तो पूरी जमीन पर 2 गज़ का टुकड़ा भी नहीं बचेगा जिसे मुसलमानों के लिए सजदागाह ना बना दिया गया हो, लेकिन मुसलमान ऐसा नहीं करता क्योंकि वह इंसाफ पसंद है और इंसाफ चाहता है मगर इंसाफ हो किस तरह कि,,,,,,,

       लिहाजा मुल्क की अदालत को अपनी गैरजिम्मेदाराना जिम्मेदारियों पर गौ़र करते हुए यह देखना चाहिए की अब मुसलमानों के सब्र का पैमाना लबरेज हो चुका है, 

अगर सुप्रीम कोर्ट मुल्क के बागियों के मुंह को लगाम नहीं लगाती, फिरका परस्ती की आग नहीं बुझाती तो फिर मुसलमान, जालिमों को उनके जुल्मों नाइंसाफी का एहसास दिलाना अच्छी तरह जानता है, मुसलमान, जुल्म का पंजा मरोड़ कर न्याय के पानी से फिरका़ परस्ती की आग बुझाना भी जानता है, मगर वह कुरान और सुन्नत की रोशनी में अपने उलेमा और मुफ्तयाने ईजा़मम के फैसले और हुकुम का मुंताजि़र है क्योंकि मुसलमान अच्छी तरह समझ रहा है कि उनकी खामोशी और ग़फलत में दूसरे फरीक़ को अपनी बात जबरदस्ती मनवाने और खिलाफ कदम उठाने का हौसला दिया है जिसके नतीजे में मुसलमानों का जानी, माली, मआशी और आर्थिक शोषण बराबर हो रहा है। मुसलमान अच्छी तरह समझ रहा है कि उनकी खामोशी और ग़फलत में दूसरे फरीक़ को अपनी बात जबरदस्ती मनवाने और खिलाफ कदम उठाने का हौसला दिया है जिसके नतीजे में मुसलमानों का जानी, माली, मआशी और आर्थिक शोषण बराबर हो रहा है यहां तक की यही खामोशी बाबरी मस्जिद के खोजाने का असल सबब बनी है,हमारा मुतालबा है की कोमी अदालतें अब किसी भी मस्जिद के बारे में सोच समझ कर फैसला लें और मुल्क के अमन व अमान और सुकून व भाईचारे के बारे में जरूर विचार विमर्श कर लें कहीं ऐसा ना हो कि मुल्क की सबसे बड़ी अदालत का सर, वतन में पनप रहे भ्रष्ट तत्व के दबाव में ऐसे तर्कहीन और गे़र मुंसिफाना फैसलों की वजह से पूरी दुनिया के सामने शर्म से झुक जाए__

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