उपमुख्यमंत्री का पद न तो संवैधानिक है और न ही किसी काम का होता है बल्कि ये सिर्फ़ राजनीतिक हित साधने के लिए होता है : श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव

पब्लिक पोलिटिकल पार्टी ने की डिप्टी सीएम पद को समाप्त करने की मांग 

उच्चतम न्यायालय में दाखिल की गई याचिका पर 12 फरवरी को होगी सुनवाई।

नई दिल्ली (अनवार अहमद नूर)

देश के विभिन्न राज्यों में जब चुनावों के बाद सरकारें बनती हैं तो अपने ख़ास ख़ास लोगों को विभिन्न मंत्रालयों का जहां कार्यभार सौंपा जाता है वहीं उपमुख्यमंत्री का एक ऐसा पद दिया जाता है जो असंवैधानिक होते हुए भी सौंपा जाता है और जो सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीतिक हित साधने के लिए होता है। इस का संज्ञान लेते हुए देशहित और सवर्णों की पब्लिक पोलिटिकल पार्टी ने विभिन्न राज्यों में नियुक्त हुए उप-मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। पपोपा की इस जनहित याचिका में कहा गया है कि संबंधित राज्य सरकारों ने भारत के संविधान और आर्टिकल 164 के प्रावधानों की अनदेखी करते हुए विभिन्न राज्यों में उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति की है जबकि भारतीय संविधान और संविधान का अनुच्छेद 164 में सिर्फ़ मुख्यमंत्री की नियुक्ति का ही प्रावधान है।


पब्लिक पोलिटिकल पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव ने कहा कि दाखिल की गई याचिका में स्पष्ट कहा गया है कि अगर उपमुख्यमंत्री की नियुक्ति की जाती है, तो इसका नागरिक और राज्य की जनता से कोई लेना-देना नहीं होता और ये पद सिवाय नाम और भ्रम पैदा करने के और कुछ नहीं होता। मैडम श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव ने कहा कि याचिका में भी कहा गया है कि उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति से बड़े पैमाने पर जनता में भ्रम पैदा होता है और राजनीतिक दलों द्वारा काल्पनिक विभाग बनाकर गलत और अवैध उदाहरण स्थापित किए जा रहे हैं। जब उपमुख्यमंत्री का पद ही नहीं है और उपमुख्यमंत्री कोई भी स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकता है तो फ़िर इस पद का क्या औचित्य है-? दिखाने के लिए तो उपमुख्यमंत्री को मुख्यमंत्री के बराबर ही दिखाया जाता है लेकिन कार्यभार संचालन में वह शून्य ही है। पब्लिक पोलिटिकल पार्टी ने याचिका के माध्यम से केंद्र सरकार से ज़ोरदार ढंग से मांग की है कि वह राज्य के राज्यपालों से देश में कथित उपमुख्यमंत्रियों को शपथ दिलाने वाली ऐसी असंवैधानिक नियुक्तियों के ख़िलाफ़ कदम उठाए और इस राजनीतिक असंवैधानिक परम्परा को समाप्त किया जाए। इस जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में 12 फरवरी को मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई करेगी।


श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव ने कहा कि 

उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति से बड़े पैमाने पर जनता में भ्रम पैदा होता है और राजनीतिक दलों द्वारा काल्पनिक विभाग बनाकर गलत और अवैध उदाहरण स्थापित किए जा रहे हैं ये परम्परा बंद होनी चाहिए क्योंकि डिप्टी सीएम कोई संवैधानिक पद नहीं है और जैसे उपराष्ट्रपति की नियुक्ति और कार्य का ज़िक्र संविधान में किया गया है उसी तरह संविधान में डिप्टी सीएम पद का कोई उल्लेख नहीं है। यह एक तरह की राजनीतिक व्यवस्था की गई है जो असंवैधानिक है। क्योंकि मुख्यमंत्री की तरह डिप्टी सीएम के पास कोई विशिष्ट वित्तीय या प्रशासनिक शक्तियां नहीं होतीं और उनकी नियुक्ति राज्य का मुख्यमंत्री करता है, डिप्टी सीएम का कोई निश्चित कार्यकाल नहीं होता है हालांकि रैंक और भत्तों के मामले में डिप्टी सीएम कैबिनेट मंत्री के बराबर होता है और उन्हें मंत्री के तौर पर ही शपथ लेनी होती है। संवैधानिक पद नहीं होने की वजह से डिप्टी सीएम की भूमिका और कार्य में कोई स्पष्टता नहीं है इन्हें बाकी कैबिनेट मंत्रियों की तरह विभाग दिए जाते हैं। फिर उपमुख्यमंत्री पद पर सुशोभित करना ग़लत है।

श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव ने कहा कि सच यही है कि डिप्टी सीएम संवैधानिक पद की बजाय एक राजनीतिक व्यवस्था है जिसे सत्तारूढ़ राजनीतिक दल अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए इस्तेमाल करते हैं साथ ही इनके ज़रिए वोट बैंक भी साधा जाता है। यह सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के वफादार और प्रभावशाली नेताओं को उपकृत करने का एक तरीका भी है जिसे बंद किया जाना चाहिए।



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