भारतीय जनता पार्टी के सांसद प्रवेश वर्मा ने विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में भाषण देते हुए मुस्लिम समुदाय के संपूर्ण बहिष्कार की बात कही और शपथ दिलाई।

Report By : S A  Betab

 भारत देश की राजधानी दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के सांसद प्रवेश वर्मा ने विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में भाषण देते हुए मुस्लिम समुदाय के संपूर्ण बहिष्कार की बात कही और शपथ दिलाई। सांसद प्रवेश वर्मा भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली में सबसे ज्यादा वोटों से जीतने वाले सांसद है। और यह पढ़े-लिखे सांसद माने जाते हैं। मुसलमानों को ठीक करने के लिए मुसलमानों को सबक सिखाने के लिए जिस रणनीति के तहत उन्होंने शपथ दिलाई उससे यह प्रतीत होता है कि भारत में एक लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष देश होने का जो अनुमान है उसे इन सांसद महोदय ने खत्म कर दिया है। और इनके अनुसार अब देश नफरत से आगे बढ़ेगा।नफरत की राजनीति ने जो नुकसान किया है वह नुकसान जनता लगातार देखती आ रही है। हिंदू मुस्लिम के नाम पर वोटों का बंटवारा करके सत्ता प्राप्ति तक पहुंचने के बाद बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संविधान पर शपथ लेकर भारत के सर्वोच्च संसदीय प्रणाली के अंतर्गत संविधान के प्रदत्त अधिकारों के तहत जो शपथ ली जाती है इन सांसद महोदय ने उस शपथ का भी उल्लंघन किया है। यह भारत के संविधान का मजाक है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का जो संविधान है उस संविधान का खुला उल्लंघन है।नफरत बर्बादी और तबाही की ओर ले कर जाती है। इसके दो उदाहरण हम यहां आपको विस्तार पूर्वक दे रहे हैं एक उदाहरण रवांडा का है और दूसरा उदाहरण जर्मनी का है। आप गौर से इसे पढ़िए और सोचिए क्या भारत को इस ओर नहीं ले जाया जा रहा है। हम सबकी जिम्मेदारी है कि भारत को रवांडा और जर्मनी बनने से बचाएं।

रवांडा नरसंहार तुत्सी और हुतु समुदाय के लोगों के बीच हुआ एक जातीय संघर्ष था। 1994 में 6 अप्रैल को किगली में हवाई जहाज पर बोर्डिंग के दौरान रवांडा के राष्ट्रपति हेबिअरिमाना और बुरुन्डियान के राष्ट्रपति सिप्रेन की हत्या कर दी गई, जिसके बाद ये संहार शुरू हुआ। करीब 100 दिनों तक चले इस नरसंहार में 5 लाख से लेकर दस लाख लोग मारे गए। तब ये संख्या पूरे देश की आबादी के करीब 20 फीसदी के बराबर थी।

इस संघर्ष की नींव खुद नहीं पड़ी थी, बल्कि ये रवांडा की हुतू जाति के प्रभाव वाली सरकार जिसने इस जनसंहार को प्रायोजित किया था। इस सरकार का मकसद विरोधी तुत्सी आबादी का देश से सफाया था। इसमें ना सिर्फ तुत्सी लोगों का कत्ल किया गया, बल्कि तुत्सी समुदाय के लोगों के साथ जरा सी भी सहानुभूति दिखाने वाले लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।

नरसंहार को सफल बनाने वालों में रवांडा सेना के अधिकारी, पुलिस विभाग, सरकार समर्थित लोग, उग्रवादी संगठन और हुतु समुदाय के लोग शामिल थे। हुतु और तुत्स समुदाय में लंबे समय से चली आ रही आला दर्जे की दुश्मनी एक बड़ी वजह थी।

जुलाई के मध्य में इस संहार पर काबू पाया गया। हालांकि, हत्या और बलात्कार की इन वीभत्स घटनाओं ने अफ्रीका की आबादी के बड़े हिस्से के लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है, इस घटना का असर लोगों के दिलो दिमाम पर आज भी बरकरार है।

इस संहार के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका, ब्रिटेन, बेल्जियम समेत तमाम देशों को उनकी निष्क्रियता के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र यहां शांति स्थापना करने में नाकाम रहा। वहीं, पर्यवेक्षकों ने इस नरसंहार को समर्थन देने वाली फ्रांस की सरकार की भी जमकर आलोचना की।  मानवाधिकार की पैरोकार अधिकांश पश्चिमी देश इस पूरे मसले को खामोशी से देखते रहे। आधुनिक शोध इस बात पर बल देते हैं सामान्य जातीय तनाव इस नरसंहार की वजह न देकर इसकी वजह युरोपीय उपनिवेशवादी देशों अपने स्वार्थों के लिये हुतू और तुत्सी लोगों को कृत्रिम रूप से विभाजित किया जाना है।

30 जनवरी के दिन साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी, तो आज ही के दिन 1933 में दुनिया की सबसे बड़ी विनाशलीला की नींव बर्लिन में पड़ी थी. क्योंकि 30 जनवरी 1933 के दिन ही हिटलर को जर्मनी की बागडोर सौंप दी गई थी और वो जर्मनी का चांसलर बना था. जर्मनी में Hitler की पार्टी चुनाव हार गई थी. लेकिन अप्रत्याशित घटनाक्रमों और चौरतफा दबाव के बीच जर्मनी के राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग ने एडोल्फ हिटलर को जर्मनी का चांसलर बना दिया था. इसी दिन जर्मनी में नाजी पार्टी की कैबिनेट ने शपथ ग्रहण कर देश की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी. हालांकि इस घटना से सिर्फ 9 महीने तक ही हिटलर हिंडेनबर्ग का सबसे बड़ा विरोधी था. 

रीचस्टैग जर्मन सरकार का मुख्यालय था और एक तरह से संसद भी. मार्च 1933 में रीचस्टैग फायर कांड के बाद हिटलर ने इसके लिए डच मूल के कम्युनिष्ट नेता मारिनस वैन डेर लुब्बे को जिम्मेदार ठहराया और अपने विरोधियों का दमन शुरू कर दिया. 24 मार्च को हिटलर की पार्टी इमरजेंसी बिल लेकर आई, जिसमें हिटलर को बेशुमार शक्तियां दे दी गई. हालांकि ये टेंपररी बिल था, लेकिन 14 जुलाई 1933 तक हिटलर जर्मनी का सर्वोच्च नेता बन गया. हालांकि राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग की मौत अगस्त 1933 में हुई, जिसके बाद हिटलर को चुनौती देने वाला कोई बचा नहीं.

Adolf Hitler ने जून 1934 में एक ब्रिटिश पत्रकार से बातचीत में सबसे बड़ा बयान दिया. जिसमें उसने कहा कि आने वाले 1000 सालों तक जर्मनी में नेशनल सोशलिस्ट मूवमेंट चलता रहेगा. उसने कहा कि 15 साल पहले तक लोग मुझपर हंसते थे, लेकिन अब पूरी जर्मनी मेरे कब्जे में है. लोग आज भी हंसते हैं, लेकिन अपनी मूर्खता की वजह से. मेरे पास असली पॉवर है. अगले 5 सालों में वो जर्मनी ही क्या, यूरोप के साथ पूरी दुनिया का मानचित्र बदलने वाला था, ऐसी किसी ने भी कल्पना नहीं की थी

Hitler के आदेश पर जर्मनी की सेना ने 1 सितंबर को पोलैंड पर हमला बोल दिया. इसे  द्वितीय विश्व युद्ध की आधिकारित शुरुआत का दिन माना जाता है. उसने अपनी कूटनीति के दम पर फ्रांस और ब्रिटेन को युद्ध से दूर रखा. हालांकि 2 दिनों बाद ही फ्रांस और ब्रिटेन ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और पूर्वी दिशा से 17 सितंबर को सोवियत सैनिकों ने पोलैंड में कदम रखा. पोलैंड को लहूलुहान किया जाता रहा और यहूदियों को सबक सिखाया जाता रहा. लेकिन जब 9 अप्रैल 1940 को जर्मन सेनाओं ने नॉर्वे और डेनमार्क पर हमला बोला, तब कहीं जाकर ब्रिटेन की आंख खुली

हिटलर की साम्राज्यवादी सनक ने पूरे यूरोप को मारकाट के मैदान में तो बदला ही था. ये लड़ाईयां दुनिया के दूसरे महाद्वीपों पर भी लड़ी जा रही थी. एशिया में जापान कहर ढा रहा था, तो अमेरिका यूरोप से लेकर एशिया तक उलझा हुआ था. द्वितीय विश्वयुद्ध में निर्णायक मोड़ 30 अप्रैल 1945 को आया, जब एडोल्फ हिटलर Adolf Hitlerने बर्लिन में चारों तरफ से घिरने के बाद जान दे दी और कुछ समय बाद हिरोशिमा-नागाशाकी पर परमाणु हमले के बाद जापान ने घुटने टेक दिए. लेकिन तबतक करोड़ों लोग मौत के मुंह में जा चुके थे. बहुत सारे देशों का मानचित्र बदल चुका था और दुनिया के बहुत सारे देश अपने हाकिमों से आजादी की मांग तेज कर चुके थे. इस महायुद्ध में करीब 9 करोड़ लोग मारे जा चुके थे. हिटलर, मुसोलिनी दुनिया से जा चुके थे और जापानी प्रधानमंत्री तोजो को साल 1948 में फांसी दे दी गई

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