मुझे पहचानते हो, मेरा नाम कांशीराम है, मैं समाज जगाने निकला हूं...- राजीव यादव

बहुजन राजनीति को संसदीय राजनीति में सत्ता पर काबिज करने वाले कांशीराम जी जिन्हें मान्यवर से संबोधित किया जाता है को आज के दौर में याद करना बहुत जरूरी है.तमाम राजनीतिक इत्तेफाकियों-नाइत्तेफाकियों के बीच इस बात को मानने में कोई संदेह नहीं कि जनता से संवाद और उस तक उनकी पहुंच का इस दौर में कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावां कोई दूसरा सशक्त उदाहरण नहीं दिखता.


वो भी बिना पूंजीपतियों और भाड़े के कार्यकर्ता और बेरोजगारों को आईटी सेल से जोड़कर माहौल बनाने वालों के बिना.जब भी क्षेत्र में जाते हैं और खास तौर पर दलित बस्तियों में तो यह पूछने पर की क्या कभी कांशीराम जी से मुलाकात हुई या देखा.

इतना कहते ही कोई न कोई किस्सा शुरू हो जाता है. जैसे निज़ामाबाद के करियाबर गांव में मिस्त्री चाचा जिनकी कुछ वक्त पहले मृत्यु हुई, जिनसे बात शुरू होते ही उन्होंने लकड़ी का काम रोककर बात शुरू की जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी.

इसी तरह 2 अप्रैल 2018 भारत बंद के दौरान सगड़ी में एक वकील साहब से बात हुई तो उन्होंने कहा कि हम लोग छोटे-छोटे थे. सामने वाले मैदान को दिखाते हुए बोले कि यहीं हम लोग खेल रहे थे तो एक अम्बेसडर कार रुकी. एक आदमी निकला और हम लोगों से पूछा मुझे पहचानते हो. हमने मना किया तो बोला कि मेरा नाम कांशीराम है, मैं समाज जगाने निकला हूं. मैंने वकील साहब से पूछा और कौन-कौन था तो उन्होंने कहा कि ड्राइवर के सिवा कोई नहीं.

आज नेताओं के लावा-लशकर, गाड़ियों के काफिले को जवाब है कि जनता-समाज के प्रति कमिटमेंट ही असली कांफिडेंस देता है, गाड़ी-घोड़ा नहीं. इस दौर में बहुजन की राजनीति करने वालों को समझना चाहिए कि जिस समाज के लिए लड़ने का दावा कर रहे, वो दिहाड़ी मजदूर है. हर दिन रैली में नहीं जा सकता. उससे मिलने चट्टी-चौराहों पर जाना होगा. एक बार एक जगह नहा रहा था तो आदतन सुबह-सुबह अपने कपड़े धो रहा था तो एक आदमी वहां गौर से देख रहे थे, और पूछे कि कपड़ा क्यों धो रहे थे. मैंने कहा सफर में आदत सी हो गई है, तो उन्होंने कहा कि मान्यवर भी ऐसा ही किया करते थे.

गांवों में कांशीराम जी को लेकर खूब सारी कहानियां हैं. हर दस-बीस किलोमीटर पर किसी चट्टी-चौराहे पर वो आए थे बैठकी किए थे ऐसे किस्से जब लोग सुनाते हैं तो मैं सोचता हूं कि कितना जन-जन तक उनकी पहुंच थी. सुल्तानपुर में कामरान भाई बता रहे थे कि तिकोनिया पार्क के एक कोने में उनको पहली बार कुछ लोगों के साथ बैठक करते देखा. बाद में बसपा का सुल्तानपुर का कार्यालय भी उनके मकान में बना. इसी तरह पिछले दिनों गोरखपुर में डॉ आरपी गौतम ने दुर्गा प्रसाद जी से मुलाकात कराई, उनके पास भी ढेरों किस्से हैं. कभी वक़्त मिला तो इन क़िस्सों को लेकर बुकलेट टाइप का कुछ लिखूंगा. खैर फेसबुक के लिए एक पोस्ट के रूप में इसे लिख रहा था, और लोगों की पढ़ने की आदत कम है इसलिए फिर कभी और बातों को साझा करूंगा. 


कांशी तेरी नेक कमाई, तूने सोती कौम जगाई

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