संजीव-नी।।

 संजीव-नी।।



आज की कविता या कविता का आज .

शब्द भी सीधे सपाट बढ़ते जाते हैं
रुकते नहीं,
नदिया भी निर्झरिणी की तरह बलखाती, लहराती, खिलखिलाती बहती है,
रुकती नहीं निर्बाध,बहती जाती है
समंदर में समूचा विलीन होने तक,
इसी तरह कविता भी पल्लवित पुष्पित होती जाती है, खंडकाव्य होने तक,
पल प्रति पल की कविता. या कविता का प्रति पल
भी इसी तरह होते हैं
मेरे घर की सीढ़ीयाँ भी
ऊपर की जाती है
नीचे क्यों कर नहीं आती,
शब्द भी इसी तरह अंतरिक्ष में चले जाते लौटकर नहीं आते
जाते हैं,
कविता,दोहा,चौपाई,और छंद बनकर,
कविता का आज,
आज की कविता भी
इसी तरह की होती है,
ऊपर जाती है सीढ़ियां संदेश बनकर फिर लौटकर कोई नहीं आती
कोई न कविता न सीढ़ियां,
बस चलती जाती है
बहती जाती है
मेरे विचारों की तरह।
संजीवनी बन कर।

संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़, 62664 19992, 90094 15 415 WT

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