राजधानी में अचानक 16 मस्जिदों में जुमे की नमाज़ को अदा करने से रोक दिया गया

 

Kalimul Hafeez
*मस्जिदों में नमाज़ से रोकने की घटनाएँ देश में कम ही होती हैं, और अगर कहीं हुई भी हैं तो उसके पीछे कुछ कारण रहे हैं, जैसे कई जगहों पर मुसलमानों के मस्लकी मतभेद ने ये हालात पैदा कर दिए थे कि पुलिस को मस्जिद बंद करनी पड़ी और जब फ़ैसला या समझौता हो गया तो मस्जिद खोल दी गई, या कहीं ग़ैर मुस्लिमों ने अपनी संपत्ति का दावा किया और बात झगड़े और अदालत तक पहुँच गई। लेकिन आज़ाद भारत के इतिहास में यह शायद पहला मौक़ा होगा कि जब देश की राजधानी में अचानक 16 मस्जिदों में जुमे की नमाज़ को अदा करने से रोक दिया गया हो। मैंने इनमें से दो मस्जिदों का दौरा किया। इमामों से मुलाक़ात की। जो विवरण सामने आया वो भविष्य के लिए बड़ी ख़तरनाक साज़िश का पता देती है।*
इमामों ने बताया कि तक़रीबन दिन के 12 बजे पुलिसकर्मी आए और बोले कि आज इस मस्जिद में जुमे की नमाज़ नहीं होगी। इत्तिफ़ाक़ ये कि उस दिन (18 मार्च) होली भी थी। इमाम साहब ने कहा, क्यों नहीं होगी? तो उस सिपाही ने कहा कि ऊपर से आर्डर है। जब कहा कि आर्डर की कॉपी दिखाइए तो उसने इमाम साहब को आँखें दिखा दीं। इमाम साहब ने कहा यहाँ होली का कोई असर भी नहीं है। आस पास रहने वाले किसी हिन्दू भाई को आपत्ति भी नहीं। अगर होली की वजह से कह रहे हैं तो हम वक़्त बदल कर पढ़ लेंगे, लेकिन पुलिस वाले ने सख़्ती से कहा कि जब तक ऊपर से आर्डर नहीं होगा हम यहाँ नमाज़ नहीं पढ़ने देंगे और इस तरह उन मस्जिदों में नमाज़ नहीं हुई।*

*इस तरह की घटनाओं से आप अन्दाज़ा लगाएँ कि देश किस रास्ते पर जा रहा है। दिल्ली की 16 मस्जिदों के इमामों को सिर्फ़ दो-तीन पुलिस वालों ने ज़बानी आदेश दे कर नमाज़ से रोक दिया। ये तमाम मस्जिदें पुरातत्व विभाग की निगरानी में हैं और यहाँ के इमाम दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के कर्मचारी हैं। आख़िर पुलिस किसी मुजरिम को भी गिरफ़्तार करने जाती है तो लिखित वारंट ले कर जाती है। अगर कोई विभाग किसी काम से रोकता है तो वो लिखित आदेश जारी करता है। ये भी देखिये कि यह घटना हुई कहाँ है? देश की राजधानी में, जिसके बारे में पूरे देश के मुसलमानों का यह गुमान है कि यहाँ सबसे ज़्यादा समझदार और जागरूक मुसलमान रहते हैं।*

*अभी तक मुसलमानों की किसी सियासी या दीनी जमाअत ने भी इस पर आवाज़ नहीं उठाई। ए. आई. एम. आई. एम. के अलावा किसी राजनीतिक दल ने भी मुँह नहीं खोला। ये कैसी बेबसी है, कैसी बेचारगी है, कितने कमज़ोर हो गए हैं हम। एक मामूली सिपाही भी हमें हमारे मज़हबी फ़राइज़ को अदा करने से रोक देगा, वो भी किसी लिखित आदेश के बग़ैर। कहाँ गई ईमानी ग़ैरत? क्या इस तरह की ज़िन्दगी भी कोई ज़िन्दगी है? डरी, सहमी, हर वक़्त अंदेशों में गिरफ़्तार! कहाँ गए वो धर्मनिरपेक्ष मुसलमान जिन्होंने अपनी क़ीमती वोट दी और सेक्युलरवादियों को जीत दिलाई थी?*

*मेरे दोस्तों: मैं बार-बार ये कह चुका हूँ कि हमारी कमज़ोरी का इलाज सिर्फ़ और सिर्फ़ ये है कि हम राजनीतिक तौर पर एक जुट हो जाएँ। राजनीतिक गठबंधन का यह मतलब नहीं है कि तुम एक साथ मिल कर बीजेपी के ख़िलाफ़ कांग्रेस, आम आदमी पार्टी या समाजवादी पार्टी को वोट दो। बल्कि राजनीतिक एकजुटता से मेरा मतलब यह है कि तुम अपने झंडे और नेतृत्व में एकजुट हो जाओ। इसलिए कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट दे कर तुम सत्तर साल से धोका खा रहे हो।*

*अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में जिसको तुमने दिल खोल कर और झोली भर कर वोट दिया था, उसने जब वक़्त पड़ा तो तुम्हें किनारे लगा दिया। उत्तर प्रदेश के उच्च सदन के लिए उसने 20 में से 15 यादवों को उम्मीदवार बनाया और तुम्हारे हिस्से में सिर्फ़ दो ही सीटें आईं। आखें खोलो। जबकि इस पार्टी को मिलने वाले कुल वोटों में आधे से ज़्यादा मुसलमानों का वोट है।*

*अब भी वक़्त है। कायर मत बनो! संविधान की सर्वोच्चता स्थापित करो। किसी ख़ाकी वर्दी वाले से डरो मत! लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी आवाज़ उठाते रहो। बातिल से आँख मिला कर बात करो। इसी तरह ख़ामोशी से ज़ुल्म सहते रहोगे तो ग़ुलामी तुम्हारा मुक़द्दर बन जाएगी।*

*ये भी कोई ज़िन्दगी है सुस्त व ग़ाफ़िल ज़िन्दगी?*

*बे हमीयत, बद गुहर, बे-रूह, बुज़दिल ज़िन्दगी।*


*भागती, बचती, दुबकती, थर-थराती ज़िन्दगी।*

*काँपती, डरती, लरज़ती, कपकपाती ज़िन्दगी ॥*


*कलीमुल हफ़ीज़*, नई दिल्ली

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