पांच राज्यों के चुनाव पर शौकत अली चेची का विश्लेषण

 समझना आसान नहीं है पांच राज्यों में चुनावी बिगुल बज चुका है प्रत्याशी मैदान में उतारे जा रहे हैं सभी जीत के दावे कर रहे हैं सरकार किसकी बनेगी गर्भ में छुपा है।लेकिन महंगाई बेरोजगारी अत्याचार भ्रष्टाचार जाति धर्म की द्वेष भावना को मध्य नजर रखते हुए पार्टियों ने  प्रत्याशी मैदान में उतरे हैं हर कोई दावे कर रहा है कि हम जाति धर्म के नाम से नफरत नहीं करते और सभी जातियों का सम्मान करते हैं,लेकिन गहराई से समझा जाए तो प्रत्याशी तो जाति का कार्ड देख कर ही मैदान में  है बाहुबली धनबली प्रत्याशी को मैदान में उतारा जा रहा है वोटरों की संख्या जाति धर्म विशेष को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशी मैदान में उतारे जा रहे हैं वोटर भी चालाक है न जाने किसका खेल कहां बिगाड़ दे काउंटिंग के बाद पता चलेगा।

चुनाव जीतने के लिए धर्म विशेष का नाम लेकर शगुन समझ कर खाना खाने पहुंच जाते हैं वैसे उन्हें अछूत समझते हैं उनके अधिकार या न्याय से कोई लेना-देना नहीं कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना इन बातों को बुद्धिजीवी लोग भली भांति जानते हैं। लेकिन कुछ पार्टियां अपने ही जाल में फंसती नजर आ रही है प्रत्याशी और वोटरों के तालमेल को बिगड़ता हुआ दृश्य साफ नजर आ रहा है गहराई से समझा जाए तो प्रत्याशी या उच्च पदों पर जिम्मेदारी एक ही कम्युनिटी के लोग ज्यादा नजर आते हैं जिससे वोटरों में अंदर खाने नाराजगी साफ नजर आ रही है यूपी की अगर बात करें तो वोटर किसी भी पार्टी या प्रत्याशी का खेल बिगाड़ सकते है यूपी में त्रिकोणीय मुकाबला प्रत्याशियों में सैकड़ों विधानसभाओं में नजर आ रहा है

गौतम बुध नगर की बात करें तो तीनों विधानसभा भी त्रिकोणीय नजर आती हैं जनता जीत का ताज किसके सर रखेगी यह तो 10 मार्च को ही पता लगेगा लेकिन मुस्लिम व दलित किसी का भी खेल बिगाड़ सकता है कहीं ना कहीं यह दोनों कम्युनिटी अपने आप को अपमानित महसूस करती दिखाई दे रही है यूपी में ही नहीं दूसरे राज्यों में भी इसका असर देखने को मिलेगा

 सब का नजरिया अलग अलग होता है गहराई से अगर समझा जाए तो राजनीतिक पार्टियां विकास के मुद्दे पर चुनाव नहीं लड़ती दिखाई दे रही है प्रत्याशियों के मैदान में उतरने से साफ नजर आ रहा है 2022 चुनाव जाति धर्म के नाम से लड़ा जा रहा है

गड़े मुर्दों को अखाड़ा जा रहा है बड़े बड़े वादे भी किए जा रहे हैं लेकिन वोटर कहीं ना कहीं नई खिचड़ी पका रहा है कौन सी पार्टी या कौन से प्रत्याशी का खेल खराब कर दे अंदाजा लगाना मुश्किल है इसी लिहाज से स्पष्ट बहुमत आता किसी भी पार्टी का यूपी में नहीं दिखाई दे रहा

ग्रामीण और शहरी वोटर अपनी अलग रणनीति बना रहा है किसान और मजदूर वोटर अपनी अलग रणनीति बना रहा है दुकानदार और नौकरी पेशा वोटर अपनी अलग रणनीति बना रहा है इन सभी में मुख्य भूमिका मैं जाति फैक्टर किसी का भी समीकरण बिगड़ सकता है

राजनीतिक पार्टियों से आगे वोटर नजर आते हैं टैक्स जीएसटी देने वाले हर परिस्थिति में एक दूसरे के सहयोगी वोटर आंखों पर काला चश्मा चढ़ा कर जिन्हें अमन चैन तरक्की भाईचारा एकता सम्मानता से कोई लेना-देना नहीं निजी स्वार्थ जाति धर्म की द्वेष भावना में मलाई खिलाने के लिए सत्ता पर बैठा देते हैं और छोड़ देते हैं एक दूसरे को लड़ाने के लिए कौन कहां खड़ा है भूल जाते हैं गालियां खाते हैं एक दूसरे को गालियां खिलाते हैं इन सभी बातों में कितना दम है समझने वाले समझते हैं लेकिन ठोकर लगने के बाद भी इंसान ऊपर वाले को ही दोषी मानता है क्योंकि काला चश्मा उसे देखने नहीं देता हाथी की तरह गर्दन नहीं  पूरा ही गोल-गोल घूम जाता है चोट लगने के बाद चिल्लाता है दर्द समाप्त होने पर सब कुछ भूल जाता है जाति धर्म विशेष का चश्मा चंद लोगों को आबाद करता है बाकी  पूरी जनता और देश को बर्बाद करता है कौन सी जागरूकता किसे अच्छी लगती है उसकी मानसिकता पर निर्भर करता है  अब इंतजार 10 मार्च का सभी को करना है किस की चौखट पर दिए जलेंगे खुशियों के और किसकी चौखट पर माहौल रहेगा मायूसी का अब से लेकर आखरी तक गणित लगाए जाएंगे जाति धर्म के आंकड़े द्वारा खेल बनाए और बिगड़ जाएंगे (जय हिंद) 

चौधरी शौकत अली चेची 

  प्रदेश अध्यक्ष 

भारतीय किसान यूनियन बलराज

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