कुसूर आजम खान का !

 एक पेड़ से दो लोगों ने अमरूद की चोरी की। जब पहले शख्स को अदालत में लाया गया तो अदालत ने सारी जिरह - बहस सुनने के बाद यह फैसला सुनाया कि अमरुद को देखकर इस शख्स का जी ललचा गया था अतः इसे माफ किया जाता है। जब दूसरे शख्स को अदालत में लाया गया  जज महोदय ने उस शख्स का भी मुकदमा सुना और उसे 2 साल की सजा सुना दी। जब दोनों व्यक्तियों का अपराध एक जैसा था तो फिर चोरी में दोनों को अलग-अलग सजाए क्यों सुनाई गई ?


एक बार तो यह सवाल आपका दिमाग चकरा देगा  लेकिन जब आप गहराई से सोचेंगे तो  आपको पता चलेगा कि उन दोनों व्यक्तियों की जातियां व धर्म अलग-अलग थे। इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि गांधी जी का साउथ अफ्रीका में ट्रेन से सामान फेंक दिया गया था। गोरे और काले के भेद को मिटाने के लिए गांधी जी ने आंदोलन किया, लड़ाई लड़ी। गोरे और काले के भेद को मिटाने के लिए इंसाफ की जरूरत होती है न कि काले आदमी को सफेद बनाने की। जो लोग बदलाव के लिए काम करते हैं उन्हें संघर्ष और बलिदान देना पड़ता है।

 सर सैयद अहमद खान बनने के लिए भी संघर्ष और बलिदान देना पड़ता है,अगर आप लोगों के हाथ से चाकू छीन कर कलम थमाने का काम करेंगे तो आप को जेल में डाल दिया जाएगा।जल पुरुष राजेंद्र सिंह के संघर्ष को देखिए तो आपको पता चलेगा कि वह लोगों के जीवन में हरियाली और खुशहाली लाने के लिए संघर्ष कर रहे थे तब  उन पर अनगिनत मुकदमे लगा दिए गए, हालांकि बाद में जब उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार से नवाजा गया तो उनके मुकदमे हटाए गए।

 इरोम शर्मिला ने 16 वर्षों तक भूख हड़ताल की सशस्त्र बल विशेष अधिनियम 1958 अफस्पा को हटाने के लिए 9 अगस्त 2016 को उन्होंने अपना अनशन तोड़ दिया और जिसका कारण उन्होने बताया कि आम जनता की उनके प्रति बेरुखी है।और उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया। और वे मणिपुर के मुख्यमंत्री बनना चाहती थी। और जब चुनाव मैदान में उतरी तो उन्हें मात्र 90 वोट मिले। इरोम शर्मिला को लगता था कि  राजनीतिक पकड़ ना होने के कारण उनकी बात नहीं मानी जा रही है इरोम शर्मिला की बात इसलिए नहीं मानी जा रही थी कि उसकी राजनीति में बहुत और पकड़ नहीं थी।

 लेकिन अब हम एक ऐसे शख्स की बात करने जा रहे हैं जो  राजनीतिक तौर पर बहुत मजबूत रहा और अपने अधिकतर चुनाव जीता उसकी पत्नी सांसद बनी, उसका बेटा विधायक बना वह विधानसभा भी जीता, लोकसभा जीता, जिस रामपुर की पहचान  रामपुरी चाकू से होती  उस शख्स ने रामपुर की पहचान जोहर यूनिवर्सिटी से करानी चाही तो उसे क्या मिला?  

उसे मिली जेल! 

और जिस राजनीति के दम पर वह ताकतवर था उस राजनीति के ही शक्तिशाली व्यक्ति ने उन्हे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। जनता कल भी खामोश थी आज भी खामोश है।

प्रस्तुति : एस ए बेताब 

संपादक "बेताब समाचार एक्सप्रेस" हिंदी मासिक पत्रिका एवं यूट्यूब चैनल

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