मरक़ज़ के दुश्मनों को औक़ात बता दीजिए


 मरक़ज़ के दुश्मनों को औक़ात बता दीजिए



छिपी है जो भी दिल में वो बात बता दीजिए,
आंधियों को चराग़ों के जज़्बात बता दीजिए।

आईन ने दिया है आप को वोट का हथियार,
मरक़ज़ के दुश्मनों को औक़ात बता दीजिए।

दहशतगर्द जैसे नाम से अलग रहना है अगर,
वो कहते है दिन में रात तो रात बता दीजिए।

मुझे सितम की हरक़त से बरसों डराने वालो,
तुम खुशी के दो चार तो लम्हात बता दीजिए।

तुम सुना तो रहे हो झूठे मन के तमाम किस्से,
दमन सहने के पहले नुक़सानात बता दीजिए।

क्या बिगाड़ लेंगे मेरा भी पत्थर के चंद टुकड़े ,
नदियों की पहाड़ों से, मुलाक़ात बता दीजिए।

कभी मंज़िले मक़सूद तक चूम तो लेंगे क़दम,
सफ़र कैसे हो इसकी शुरूआत बता दीजिए।

आवाज़ इबादत की सुकूं छीनती हो जिसका,
उसे भी इंसानियत के निशानात बता दीजिए।

ज़फ़र पूंछे अगर कोई तो पानी की जुस्तजू में,
ज़ख्म मिलते हैं मुल्क़ में हालात बता दीजिए।

-ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र
एफ-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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