वो चल दिया तो रफ़ाकत के सारे रंग गये

सरफ़राज़ अहमद फ़राज़ देहलवी 

 वो चल दिया तो रफ़ाकत के सारे रंग गये

मैं किस से रूठ सकूँगा किसे मनाऊँगा

                    - सरफ़राज़ अहमद फ़रा

स्वर्गीय  सर्वेश चंदौसवी

ज़ देहलवी 

उर्दू ज़बान के लिए तारीख़ का वो दिन मोज़्ज़िज़ घराने में एक ऐसी किरन फूटी जिसने पूरे खानवादे को बहुत जल्द अपनी जानिब मुतावज्जा कर लिया। मौज़ूदा दौर के शायरों में जो नाम उभरकर सामने आते हैं, उसमें सर्वेश चंदोसवी का नाम सर-ए-फ़हरिश्त है। सर्वेश चंदोसवी की शायरी मौज़ूदा ज़माने के साथ क्लासिकी रवायत से जुड़ी हुई है। इस अहद के लिखने वालों को पढ़कर उन पर माज़ी में लिखने वालों की याद ज़हन में ग़ालिब होने लगती है। मगर सर्वेश चंदोसवी को पढ़कर 'सर्वेश चंदोसवी' ही ज़हन में आते हैं, कोई दूसरा नहीं।

सर्वेश चंदोसवी वैसे तो उर्दू के शायर थे, मगर उन्होंने हिन्दी का इस्तेमाल करने में भी परहेज़ नहीं किया। सर्वेश चंदोसवी की शायरी का एक बड़ा हिस्सा ग़ज़लियात का है, मगर उन्होंने नाअत, नज़्मों, रुबाइयात और क़तात का भी इस्तेमाल अपनी शायरी में किया है। सर्वेश चंदोसवी बुनियादी तौर पर ग़ज़ल के शायर थे। इसलिए जो रचा हुआ अंदाज़, दर्द की कसक और जमातियाती कैफ़ियत उनकी ग़ज़लों में है, वो दूसरी असनाफ़ में कम ही नज़र आती है। 

सर्वेश चंदोसवी ने ज़िन्दगी से समझौता किया, जज़्बात की क़ुरबानी दी और शीश-ए-अहसास को बचाये रखने की क़ीमत शकिस्ता दिल से अदा की, मगर अपनी अना का सौदा कभी नहीं किया। 

मैं ऐसे जाँबाज़ अदब के सिपाही को सलाम करता हूँ और ख़ुदा से दुआ करता हूँ कि उस अज़ीम हस्ती को जहाँ भी रखे, अपनी अमर ज़िन्दगी में सुख और चैन से रखे। 'तथास्तु'! 

                 - सरफ़राज़ अहमद फ़राज़ देहलवी 

      चेयरमैन :- बज़्म-ए-फ़राज़-ए-अदब, दिल्ली

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