हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति लिए लिखित* *परीक्षा से ही संविधान का* *सम्मान होगा न कि सुप्रीम* *कोर्ट की स्थापना दिवस मनाने* से।

 *लोक समाज पार्टी* 4 फरवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट सीजेआई की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट का स्थापना दिवस समारोह मनाया गया। इसके माध्यम से संविधान के प्रति सम्मान प्रकट किया गया आजादी के पहले आजादी के पहले 26 मार्च 1774 में ब्रिटेन के राजा जार्ज तृतीय के शासनकाल में भारत के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के माध्यम से कोलकाता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना किया गया था


उस समय कुछ-कुछ आज के सुप्रीम कोर्ट की तरह मामला देखने का अधिकार था लेकिन आजादी के बाद 26 नवंबर 1949 को भारत का संविधान स्वीकार किया गया और 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू कर दिया गया जबकि उसके 2 दिन बाद जो फेडरल कोर्ट था  उसी स्थान को सुप्रीम कोर्ट 28 जनवरी 1950 को स्थापित किया गया। तब से लेकर अब तक कभी भी सुप्रीम कोर्ट का स्थापना दिवस नहीं मनाया गया लेकिन वर्तमान के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व में 4 फरवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट स्थापना दिवस समारोह मनाया गया।

    इस समारोह के माध्यम से यह संदेश दे दिया गया के सुप्रीम कोर्ट संविधान के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन जो सुप्रीम कोर्ट की कोलोजियम व्यवस्था के माध्यम से देश के सो डेढ़ सौ घरानों के लिए हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा आरक्षित कर दिया गया है जबकि बहुत बड़ी आबादी के लोगों के पात्र लोगों के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दरवाजा लगभग बंद कर दिया गया है। पिछले 73 सालों से खासकर 1993 से चली आ रही यह अन्याय तभी समाप्त होगा जब *हाईकोर्ट के जजों* *की* *नियुक्ति के लिए पूरे देश में यूपीएससी* *के* *तर्ज पर एक लिखित* *परीक्षा का आयोजन कराया जाए* जिसमें संविधान के अनुच्छेद 217 की पात्रता को योग्यता रखने वाले देश के सभी नागरिकों को शामिल होने का अवसर मिले जो लिखित परीक्षा में पास हो वही हाई कोर्ट जज बने जब भारत सरकार दृढ़ता पूर्वक इस मैकेनिज्म को स्थापित करेगी तब जाकर के संविधान का संरक्षण होने के साथ-साथ डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के आत्मा को शांति मिलेगी कि इस देश में सभी लोगों को हाई कोर्ट जज बनने का अधिकार लागू हो गया है।

   *सुप्रीम कोर्ट के कुछ ऐतिहासिक फैसले*

 *एम आर बालाजी बनाम स्टेट ऑफ* *मैसूर* 1963AIR 649

    इस केस में सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक पीठ ने यह एक लकीर खींच दी के किसी भी हालत में आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं हो सकता है और यह नजीर तब से सभी ऐसे मामलों में लागू होती रही।यही फॉर्मूला मंडल कमीशन के नाम से फेमस केस *इंदिरा साहनी बनाम यूनियन* * *युनियन ऑफ इंडिया*    AIR 1973 SC 477के केस में भी लागू हुआ था।

 *आई सी गोलकनाथ* बनाम

 *पंजाब राज्य* 1967 AIR SC 1463 इस केस में सुप्रीम कोर्ट के 11 जजों में से 5 के मुकाबले 6 (6: 5) जजों ने यह माना था की संसद को मौलिक अधिकारों का संशोधन नहीं कर सकती है जबकि

 *केशवानंद भारती* बनाम *यूनियन* *ऑफ इंडिया* AIR 1973 SC 1461 इस केस में सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों के विशेष पीठ में से 6 के मुकाबले 7, (7:6)जजों ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया की संसद संविधान के किसी भी अनुच्छेद को संशोधित कर सकती है बशर्ते वह संविधान के मूलभूत ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती है और इस प्रकार ऐसी गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के केस को पलट दिया गया था।

 *इंदिरा गांधी* बनाम *राजनारायण* 1975 AIR 865 

इस केस में रायबरेली से श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ राजनारायण ने चुनाव लड़ा था और उस समय राजनरायण जी ने यह आरोप लगाया कि श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रहते हुए सत्ता का दुरुपयोग किया इसलिए इनका चुनाव रद्द किया जाना चाहिए इस फैसले में तत्कालीन इलाहाबाद के तत्कालीन न्यायमूर्ति जगदीश लाल सिन्हा अर्थात जे एल सिन्हा ने यह माना के श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए इस चुनाव में पद और सत्ता का दुरुपयोग किया इसलिए उनके चुनाव को रद्द करते हुए उन्हें आगामी 6 साल चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था वही इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिया गया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि वह प्रधानमंत्री रह सकती हैं लेकिन वह संसद के कार्यवाही में वोटिंग नहीं कर सकती हैं और ऐसे हालात में उन्होंने एक असाधारण फैसला 24 जून 1975 की रात में देश में आपातकाल लागू कर दिया गया जिसमें देश के नागरिकों के प्रदत्त मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था और ऐसे ही एक मामला *एडीएम जबलपुर बनाम* *शिवाकांत शुक्ला* (1976)2 SCC 521 इस मामले में शिवाकांत शुक्ला को मिशा के अंतर्गत बंद कर दिया गया था जिसको सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया गया सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक पीठ अर्थात 5 जजों के बेंच में से एक के मुकाबले चार जजों(4:1) ने यह माना कि आपातकाल में नागरिकों को अधिकार के संदर्भ में न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है जबकि 4 जजों के खिलाफ न्यायमूर्ति एचआर खन्ना ने माना था कि आपातकाल में भी अगर नागरिकों के अधिकार प्रतिबंधित होते हैं तभी भी नागरिकों को न्यायालय में जाने का अधिकार संरक्षित है। एचआर खन्ना के इस भिन्न मत को अमेरिका में भी बड़ी सराहना हुई कि वहां पर आज भी ऐसे साहसी जज हैं जो इंदिरा गांधी के खिलाफ संविधान की सही व्याख्या की है।

 *वचन सिंह बनाम पंजाब राज्य* 1982AIR 1325 इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ में मर्डर के केस में फांसी के सजा सुनाए जाने के संदर्भ में डॉक्ट्रिन ऑफ़ रेरेस्ट  ऑफ द रेयर केस का सिद्धांत प्रतिपादित किया अर्थात फांसी की सजा अति दुर्लभ हालात में दी जानी चाहिए।

 *मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य* 

1983 AIR 957 इस केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा के संदर्भ में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया के उम्र कैद नियम है और फांसी विशेष हालत में दी जानी चाहिए और मृत्युदंड की सजा के संवैधानिक ताको चैलेंज किया गया था जिसको सुप्रीम कोर्ट ने माना के मृत्युदंड का फैसला संविधान के अनुसार है यह असंवैधानिक नहीं है।

 *शरद चंद बिरदी बनाम महाराष्ट्र* *सरकार* AIR 1984 SC 1622

इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने मर्डर के केस में सरकमस्टेंशियल एविडेंस के हालात में पंचशील नामक 5 सरकमस्टेंसस का सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसमें यह माना गया कि अगर कत्ल का केस स्टार विटनेस पर न हो तो केस के हर कड़ी का जोड़ा जाना आवश्यक है। अगर कहीं भी केस की कड़ी टूटती है तो उसका बेनिफिट मुलजिम को मिलना चाहिए। इसमें यह भी कहा गया कि अगर जज को यह मिले कि इस केस में दो परिस्थितियां बन रही हैं एक परस्थिति मुलजिम के फेवर में और दूसरी परस्थिति मुलजिम के खिलाफ तो न्याय का तकाजा यही है कि मुलजिम के फेवर की परस्थिति को स्वीकार किया जाना चाहिए और यह फैसला बहुत ही ऐतिहासिक रहा है तब से लेकर अब तक हर सरकमस्टेंशियल केस में शरद चंद्र विरदी वर्सेस स्टेट ऑफ महाराष्ट्र का मामला साइट किया जाता है।

 *एस आर बोमई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया* (1994)3 SCC 1

इस केस में उड़ीसा के तत्काल मुख्यमंत्री एसआर बोमई की सरकार को राज्यपाल की रिपोर्ट पर केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत बर्खास्त कर दिया गया था। जिसको सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की विशेष पीठ ने यह निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 356 में केंद्र को असाधारण शक्ति प्रदान करता है लेकिन इस क्षमता का प्रयोग संयम और अत्यधिक सावधानी पूर्वक के साथ किया जाना चाहिए अदालत ने 356 के संदर्भ में डॉक्टर बी आर अंबेडकर का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि आपातकालीन घटनाएं सबसे अजीब लोगों को आकर्षित करेंगी।

   *इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया* & अन्य AIR 1993 SC 477 इस केस में 13 अगस्त 1990 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह केंद्रीय नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए 27 परसेंट आरक्षण लागू किया था। इस अधिसूचना के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी और अंदर ही अंदर से कांग्रेस पार्टी ने मिलकर के काफी विरोध किया देश में जगह-जगह बसे तोड़ी गई और दिल्ली में कई लोगों को आत्महत्या करने के लिए उकसाया गया इस फैसले के खिलाफ  200 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में डाली गई उन सभी याचिकाओं का निपटारा 1992 में किया गया सुप्रीम कोर्ट के विशेष पीठ अर्थात 9 जजों की बेंच का गठन किया गया। जिनमें तीन के मुकाबले 6 (6:3) जजों ने माना की की आजादी के बाद भी 1990 तक केंद्रीय सरकारी नौकरियों में ओबीसी को मात्र डेढ़ प्रतिशत नौकरी दिया गया है जबकि इनकी आबादी 52 परसेंट है और यह माना कि मंडल कमीशन संविधान के अनुरूप है जबकि मंडल कमीशन के खिलाफ लगी आग को बुझाने के लिए तत्कालीन सामाजिक न्याय के पुरोधा प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने 10% गरीबी के आधार पर आरक्षण घोषित किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से उसको नकार दिया और कहा कि यह संविधान के खिलाफ है।

       इसके बाद भी भी सुप्रीम कोर्ट में कई ऐतिहासिक फैसले आए जैसे रफेल का फैसला, श्री राम जन्मभूमि का फैसला, निजता के आधार का फैसला समय-समय पर आए जो महत्वपूर्ण रहे। मोदी काल में ही जिन जजों ने मोदी और अमित शाह के फेवर में फैसला दिए हैं उनको कहीं का गवर्नर और राज सभा सदस्य बनाया गया है जिससे निस्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है।

    सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर अपने साहस का परिचय दिया है लेकिन कई ऐसे मौके आए हैं जो सुप्रीम कोर्ट देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने से घबरा गए वहीं पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने वहां के तानाशाह परवेज मुशर्रफ को ऐसा बाधा के उनको गद्दी छोड़कर पाकिस्तान से भागना पड़ा जबकि यह ऐसा साहस सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जगदीश लाल सिन्हा और जस्टिस एच आर खन्ना को छोड़कर किसी जज में साहस नहीं हुई। हम सुप्रीम कोर्ट को सम्मान करते हैं लेकिन यह सम्मान तब और होगा जब सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम व्यवस्था खुद अपनी व्यवस्था को रद्द कर दें और सरकार खासकर मोदी सरकार जो सबका साथ, सबका विकास,सबका विश्वास की बात करती है वह आईएएस & आईपीएस की तर्ज पर यूपीएससी की तरह हाई कोर्ट अखिल भारतीय जुडिशल कमिशन की स्थापना करें। जिसमें *हाईकोर्ट के जजों* की *नियुक्ति की जिम्मेदारी देश के* *प्रॉमिनेंट ला प्रोफेसरों को दे। वे* लोग पूरे देश में संविधान के अनुच्छेद 217 के शर्तों को पालन करने वालों को लिखित परीक्षा कराने का काम करें जो *हाईकोर्ट के लिखित परीक्षा* में *पास हो वही हाईकोर्ट*हो **वही जज बने* । जब ऐसा होगा तो *डॉक्टर भीमराव अंबेडकर* के आत्मा को शांति मिलेगी कि आज देश में वास्तव में संविधान का राज और कानून का शासन लागू हुआ है धन्यवाद।

 *जय हिंद जय समाजवाद जय संविधान* ।

 *गौरी शंकर शर्मा ( *ऐडवोकेट)* 

 *राष्ट्रीय अध्यक्ष लोक समाज पार्टी* 

8920651540

9911140170

वेबसाइट

www.loksamajparty.com

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