दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग द्वारा स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में शहीदों के संघर्ष पर सेमिनार आयोजित किया गया

बेताब समाचार एक्सप्रेस के लिए दिल्ली से शाहिदा खातून के साथ रूबी न्यूटन की रिपोर्ट, 

दिल्ली के ऐवान ए ग़ालिब, सभागार में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की जानिब से जश्न ए आजादी के मौके पर 1857 से लेकर 1947 तक देश के लिए कुर्बानी देने वाले शहीदों की याद में एक सेमिनार आयोजित किया गया| आज हुए सेमिनार में मुख्य अतिथि पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र पाल गौतम दिल्ली


सरकार रहे, इसके अलावा अब्दुल रहमान विधायक सीलमपुर विधानसभा क्षेत्र दिल्ली भी कार्यक्रम में मौजूद रहे, कार्यक्रम में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन जा़किर खान मंसूरी के साथ ही दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के एडवाइजरी मेंबर और सद्भावना समिति के सदस्यों ने कार्यक्रम में उपस्थित रहकर कार्यक्रम की रौनक बढ़ाई, वही कार्यक्रम में आईएएस कोचिंग के संचालक अमित कुमार भी उपस्थित रहे| कार्यक्रम में

उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा की 1772 में शाह अब्दुल अजीज ने भी अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ जिहाद का फतवा दिया था, यह दौर हमारे इतिहास 1857 की मंगल पांडे की क्रांति को आजादी की पहली क्रांति माना जाता है, शाह अब्दुल अजीज ने 85 साल पहले भारत वासियों के दिलों में आजादी की क्रांति की लौ जलाई थी, आज के वक्त में

कुछ मुट्ठी भर लोगों ने यह भ्रम फैला रखा है कि मुसलमानों ने देश की आजादी के लिए कुछ नहीं किया, ऐसे में उन्हें यह जान लेने की जरूरत है कि मुसलमान हिंदुस्तान के लिए कुर्बानी देते आए हैं, और हमेशा देते रहेंगे, हिंदुस्तान को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कर भारत के निर्माण में हिंदुओं के साथ मुसलमानों का भी अहम योगदान रहा है| जंगे आजादी में हिंदू भाइयों के साथ ही मुसलमानों ने भी अपनी जान निछावर कर दी है, लेकिन आज कुछ तत्व देश के मुसलमान को गद्दार और देशद्रोही साबित करने पर तुले हुए हैं, परंतु इतिहास इस बात का गवाह है की दिल्ली में जमा मस्जिद से लाल किले के बीच मैदान में कई उलमाओं को निर्वस्त्र कर जिंदा जलाया गया था, लाहौर की शाही मस्जिद में भी प्रतिदिन 80 मौलवियों को फांसी देकर उनकी लाशें रवि नदी में फेंक दी जाती थी, इतिहासिक किताब 'लहू बोलता है' में मुस्लिम लीग के निर्माण की ऐतिहासिक परिस्थितियों का भी उल्लेख है, और कांग्रेस के भीतर मुसलमानों को लेकर की गई अंदरूनी सियासत का भी जिक्र किया गया है, अट्ठारह सौ सत्तावन की लड़ाई हिंदू और

मुसलमान भाइयों ने साथ मिलकर लड़ी थी, और उस जंग में एक लाख मुस्लिम मारे गए थे, कानपुर से फर्रुखाबाद के बीच सड़क के किनारे जितने भी पेड़ थे उन पर अंग्रेजों ने मौलानाओं को फांसी दे दी थी, इसी तरह राजधानी दिल्ली के चांदनी चौक से लेकर खैबर तक भी जितने पेड़ थे उन पर भी उलमाओं को फांसी पर लटकाया गया था, करीब 14 हजार उलेमाओं को सजा ए मौत दे दी गई थी, परंतु इतिहास लेखन में पूरी तरह न्याय ना होने के कारण भी मुसलमानों के 1857 से लेकर 1947 तक देश की आजादी के लिए किए गए योगदान को ठीक से जाना नहीं गया है| कार्यक्रम के अंत में सर्व धर्म सद्भाव एवं राष्ट्रहित के लिए किए गए आज के सेमिनार के आयोजक दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के  अध्यक्ष जाकिर खान मंसूरी एवं दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के एडवाइजरी मेंबरों और सद्भावना समिति के सदस्यों को बधाई देते हुए भविष्य में इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करने का आग्रह भी किया,

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