अदालत ने मलियाना में हुए नरसंहार के 36 साल पुराने मामले के 40 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया

मेरठ, 2 अप्रैल (एजैंसी) : नगर की एक अदालत ने मलियाना में हुए नरसंहार के 36 साल पुराने मामले के 40 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया है। शनिवार को अपर जिला व सत्र न्यायाधीश लखविंदर सूद ने फैसला सुनाते हुए 40 आरोपितों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। हालांकि,पीड़ित परिवारों के सदस्यों ने फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करने की बात कही है आरोपितों के अधिवक्ता सीएल बंसल ने बताया कि अदालत ने साक्ष्य के अभाव में आरोपितों को बरीकर दिया। अपर जिला शासकीय अधिवक्ता(एडीजीसी) सचिन मोहन ने पत्रकारों को बताया कि 23 मई 1987 को मेरठ के मलियाना होली चौक पर यह घटना हुई थी, जिनमें वादी याकूब अली निवासी मलियाना ने 93 लोगों के खिलाफ 24 मई 1987 को नामजद मुकदमा दर्ज कराया था। 23 मई की घटना में करीब 63 लोग मारे गए थे और 100 से भी ज्यादा घायल हुए थे।


23 मई 1987, दोपहर के करीब दो बजे थे। चारों तरफ चीखपुकार मची थी। हर तरफ गोलीबारी हो रही थी, घर के पास दंगाई आ गए तो परिवार के सदस्य यहां से निकलकर थोड़ी दूर जाकर छिप  गए। कुछ दंगाई अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे। एकाएक उन्होंने मकान में आग लगा दी। वो मंजर दिल दहलाने वाला था।

उनका आशियाना आंखों के सामने ही जलता रहा, मगर वह बेबस रहे। परिवार ने किसी तरह भागकर जान बचाई। यह दास्तां सुनाते हुए दंगा पीड़ित मोहम्मद शरीफ उर्फ भूरे ने बताया कि आशियाना तो खाक हो गया, गनीमत रही कि परिवार के सदस्य बच गए। सेना के आने के बाद वह जले हुए मकान में पहुंचे। यहां सिर्फ राख ही थी। यह दिन वह कभी नहीं भूल पाए।

मोहम्मद शरीफ ने बताया कि लंबे संघर्ष के बाद दोबारा आशियाना तैयार किया। उनकी तरह चमन और नौशाद अली के आशियाने भी दंगे में जल गए थे। उस समय नौशाद की उम्र 15 साल ही थी। मलियाना दंगे को भले ही करीब 36 साल हो गए हों, लेकिन कुछ परिवारों के लिए यह दंगा अभिशाप बन गया। ये परिवार इसे अब तक नहीं भूल पाए हैं।दंगे ने छुड़ाई दहलीज... दूसरे शहरों में जाकर बस गए सात परिवार

इसी दंगे के कारण सात परिवारों को घर की दहलीज छोड़कर दूसरे शहरों में जाकर बसना पड़ा। दहशत का आलम यह है कि इतना समय बीतने के बाद भी वह फिर से गांव में आने को तैयार नहीं हैं।

परिवार में बचे थे अब्दुल सत्तार और उसकी बहन


दंगे के दौरान लगभग 63 लोगों की मौत हुई थी। इनमें अब्दुल सत्तार के परिवार के भी 11 लोग शामिल थे। जिस समय दंगा हुआ, उस वक्त अब्दुल सत्तार घर पर नहीं था और उसकी बहन अपनी नानी के घर गई थी। 

घर पर परिवार के अन्य सदस्य थे। दंगे में उसके परिवार के 11 सदस्यों की हत्या कर दी गई थी, जिनके शव कुएं में पड़े मिले थे। इस नरसंहार के बाद अब्दुल सत्तार और उसकी बहन ने गांव छोड़ दिया था। वह मकान बेचकर गाजियाबाद में जाकर रहने लगे। छीन ली थी कैमरे की रील, नहीं खींचने दिए फोटो 

वरिष्ठ छायाकार मुन्ना खान बताते हैं कि घटना के बाद वह अपनी टीम के साथ वहां पहुंचे। हर गली में खून से लथपथ शव पड़े थे। अखबार की कवरेज के लिए काफी फोटो भी खींच लिए थे, लेकिन तभी पीएससी के जवानों ने उन्हें रोक लिया और कैमरे की रील छीनकर उसे नष्ट कर दिया। आज भी जब उन गलियों से गुजरते हैं तो अक्सर वह मंजर याद आ जाता है।



दुकान में आग लगाई और लूटपाट की

दंगा पीड़ित वकील अहमद का कहना है कि दंगे के समय उनके हाथ और कमर में गोली लगी थी। उनकी आंखों के सामने कई लाशें थीं। दूसरे वर्ग के जिन लोगों के साथ वह लंबे समय से रह रहे थे, वही लोग उनसे नफरत कर रहे थे। इसी दंगे में रेलवे रोड पर उनकी एक दुकान को भी आग लगाकर लूटपाट की गई थी। इसकी रिपोर्ट की प्रति आज भी उनके पास है। इस दौरान किसी ने भागकर तो किसी ने छिपकर जान बचाई। लोनी में बस गया सरताज का परिवार

सरताज और उसका परिवार भी दंगाइयों से प्रभावित रहा। दंगा शांत होने के बाद सरताज और परिवार के अन्य सदस्य गांव छोड़कर चले गए थे, जो लोनी में जाकर बस गए। हालांकि वह कभी-कभी गांव में आते हैं, लेकिन जैसे ही गांव की उन गलियों से गुजरते हैं तो आंखें नम हो जाती है। दंगे से पीड़ित परिवार वो मंजर आज तक नहीं भूल पा रहे हैं। इन परिवारों के अलावा भी चार अन्य परिवार गांव से पलायन कर गए थे। उनके बारे में किसी को जानकारी नहीं है।शाहिना ने पेट पर बांधे थे गहने, तलवार से हमलाकर लूट ले गए दंगाई 


मलियाना के रहने वाले इस्तेखार अली ने बताया कि दंगे के दौरान जिस समय लूटपाट हो रही थी, उस वक्त उसकी चचेरी बहन शाहिना ने पेट पर गहने और रुपये बांध लिए थे, ताकि वह बाहर जाकर परिवार की गुजर-बसर कर सके, लेकिन दंगाइयों ने उसे भी नहीं छोड़ा। उसके पेट पर तलवार से वार किया। गहने और रुपये लूटकर ले गए। इसमें शाहिना घायल हो गई थी। दंगे के करीब एक साल बाद उसकी मौत हो गई थी।


दंगे का नाम सुनते ही उड़ जाती थी नींद

शहर में जब भी दंगा होता था तो उनकी रातों की नींद उड़ जाती थी। वह पूरी रात करवटें बदलते रहते थे। शहर में दंगे का नाम सुनते ही उन्हें डर सताने लगता था कि कहीं दोबारा से उन्हें फंसाकर गिरफ्तार न कर लिया जाए। यह बात मलियाना में नरसंहार के आरोपियों में शामिल रहे आरटीओ पुलिस से रिटायर्ड कालीचरण ने कही।


दंगे ने छुड़ाई दहलीज... दूसरे शहरों में जाकर बस गए सात परिवार

इसी दंगे के कारण सात परिवारों को घर की दहलीज छोड़कर दूसरे शहरों में जाकर बसना पड़ा। दहशत का आलम यह है कि इतना समय बीतने के बाद भी वह फिर से गांव में आने को तैयार नहीं हैं।


परिवार में बचे थे अब्दुल सत्तार और उसकी बहन

दंगे के दौरान लगभग 63 लोगों की मौत हुई थी। इनमें अब्दुल सत्तार के परिवार के भी 11 लोग शामिल थे। जिस समय दंगा हुआ, उस वक्त अब्दुल सत्तार घर पर नहीं था और उसकी बहन अपनी नानी के घर गई थी। 


घर पर परिवार के अन्य सदस्य थे। दंगे में उसके परिवार के 11 सदस्यों की हत्या कर दी गई थी, जिनके शव कुएं में पड़े मिले थे। इस नरसंहार के बाद अब्दुल सत्तार और उसकी बहन ने गांव छोड़ दिया था। वह मकान बेचकर गाजियाबाद में जाकर रहने लगे। 

छीन ली थी कैमरे की रील, नहीं खींचने दिए फोटो 

वरिष्ठ छायाकार मुन्ना खान बताते हैं कि घटना के बाद वह अपनी टीम के साथ वहां पहुंचे। हर गली में खून से लथपथ शव पड़े थे। अखबार की कवरेज के लिए काफी फोटो भी खींच लिए थे, लेकिन तभी पीएससी के जवानों ने उन्हें रोक लिया और कैमरे की रील छीनकर उसे नष्ट कर दिया। आज भी जब उन गलियों से गुजरते हैं तो अक्सर वह मंजर याद आ जाता है।


दुकान में आग लगाई और लूटपाट की

दंगा पीड़ित वकील अहमद का कहना है कि दंगे के समय उनके हाथ और कमर में गोली लगी थी। उनकी आंखों के सामने कई लाशें थीं। दूसरे वर्ग के जिन लोगों के साथ वह लंबे समय से रह रहे थे, वही लोग उनसे नफरत कर रहे थे। इसी दंगे में रेलवे रोड पर उनकी एक दुकान को भी आग लगाकर लूटपाट की गई थी। इसकी रिपोर्ट की प्रति आज भी उनके पास है। इस दौरान किसी ने भागकर तो किसी ने छिपकर जान बचाई। 

लोनी में बस गया सरताज का परिवार

सरताज और उसका परिवार भी दंगाइयों से प्रभावित रहा। दंगा शांत होने के बाद सरताज और परिवार के अन्य सदस्य गांव छोड़कर चले गए थे, जो लोनी में जाकर बस गए। हालांकि वह कभी-कभी गांव में आते हैं, लेकिन जैसे ही गांव की उन गलियों से गुजरते हैं तो आंखें नम हो जाती है। दंगे से पीड़ित परिवार वो मंजर आज तक नहीं भूल पा रहे हैं। इन परिवारों के अलावा भी चार अन्य परिवार गांव से पलायन कर गए थे। उनके बारे में किसी को जानकारी नहीं है।

शाहिना ने पेट पर बांधे थे गहने, तलवार से हमलाकर लूट ले गए दंगाई 

मलियाना के रहने वाले इस्तेखार अली ने बताया कि दंगे के दौरान जिस समय लूटपाट हो रही थी, उस वक्त उसकी चचेरी बहन शाहिना ने पेट पर गहने और रुपये बांध लिए थे, ताकि वह बाहर जाकर परिवार की गुजर-बसर कर सके, लेकिन दंगाइयों ने उसे भी नहीं छोड़ा। उसके पेट पर तलवार से वार किया। गहने और रुपये लूटकर ले गए। इसमें शाहिना घायल हो गई थी। दंगे के करीब एक साल बाद उसकी मौत हो गई थी।


दंगे का नाम सुनते ही उड़ जाती थी नींद


35 साल से था फैसले का इंतजार

कालीचरण का कहना था कि वह 35 साल से इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे। शनिवार को कोर्ट के फैसले के बाद अब कुछ सुकून मिला है। मूलरूप से मलियाना और हाल में गंगा कॉलोनी के रहने वाले कालीचरण ने बताया कि दंगे के समय वह आरटीओ पुलिस में थे। मलियाना में नरसंहार हुआ। यहां हर तरफ लाशों के ढेर दिखाई दे रहे थे। 


वह वर्दी पहनकर ड्यूटी पर जा रहे थे कि उन्हें भी दंगे का आरोपी बनाकर जेल भेज दिया गया। डेढ़ माह तक जेल में रहने के बाद वह जमानत पर आए तो मामला शांत हो गया था। दंगे ने उन्हें ऐसी चोट दी कि वह सिपाही के पद से ही रिटायर्ड हो गए, उन्हें पदोन्नति तक नहीं मिल सकी। कालीचरण ने बताया कि मलियाना में उनका परिवार सम्मानित परिवारों में गिना जाता था। उनके बड़े भाई कैलाश भारती राजनीति से जुड़े थे। दंगे में उनका भी नाम आया गया था। इसके बाद से उनका राजनीतिक करियर समाप्त हो गया था

पोता-पोती संग बांटते हैं दर्द 

कालीचरण ने बताया कि उनकी उम्र 67 साल हो चुकी है। उन्होंने अपने जीवन में ऐसा मंजर नहीं देखा है। हर तरफ लाश और आगजनी के साथ चींख-पुकार का आलम था। उस दिन का मंजर याद आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जब कभी भी यह घटना याद आती है तो पोता-पोती के साथ मिलकर दर्द बांट लेते हैं।

आजादी के बाद की सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग हुई 

मेरठ में दो मोहल्ले थे हाशिमपुरा और मलियाना। यहां आसानी से पुलिस भी नहीं जा पाती थी। हिंदुओं ने इन्हें मिनी पाकिस्तान घोषित कर रखा था। पीएसी को कमांड कर रहे सब इंस्पेक्टर ने सोचा कि मिनी पाकिस्तान को कंट्रोल करने का एक ही तरीका है कि मुसलमानों के साथ सख्ती की जाए। देखिए कितनी भयानक सख्ती हुई। सैकड़ों लोगों को घर से निकाला गया और अनेक लोगों को मार दिया गया। लेखक होने के नाते मैंने पीएसी के अधिकारी से पूछा था कि जो लोग मारे गए थे किसी से पहले मिले थे, उसका जवाब था नहीं। लेखक होने के नाते मैं जानना चाहता था कि हत्यारा अपना शिकार क्यों चुनता है ?, मेरठ दंगे में आजादी के बाद की सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग हुई। दंगे कांग्रेस ने तो नहीं कराए थे, पर इतनी गंभीर घटना पर वह प्रतिक्रिया नहीं आई जो सरकार की तरफ से आनी चाहिए थी। - विभूति नारायण राय, साक्षात्कार में। साकार :अमर उजाला 

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