गुस्ताख़ ए रसूल नूपुर शर्मा के ताल्लुक़ से सुप्रीमकोर्ट के तब्सरे ने अँधेरे में रौशनी फैलाने का काम किया लेकिन......

 हफ़्तावार मज़मून हाज़िर ए ख़िदमत है (6.7.22)

*‘तुंदी ए बाद ए मुख़ालिफ़ से न घबरा ऐ उक़ाब’*

कलीमुल हफ़ीज़ 

*अम्न व अमान, सद्भावना, भाईचारा और गंगा जमुनी तहज़ीब के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हमारे प्यारे देश हिन्दुस्तान को न जाने किसकी नज़र लग गयी। कोरोना जैसी वबा ने देश और दुनिया की सतह पर जो तबाही मचाई थी उसके बाद होना यह चाहिए था कि मुल्क को तरक़्क़ी के रास्ते पर लगाया जाता, रोज़गार को बढ़ावा दिया जाता, महंगाई पर क़ाबू पाया जाता, भाईचारे को मज़बूत किया जाता, अमन व अमान को क़ायम किया जाता लेकिन इसके ख़िलाफ़ बातें नज़र आ रही हैं।*

*ऐसा लग रहा है जैसे मुल्क के विकास की किसी को फ़िक्र नहीं है और न ही यह कोई विषय है। बेरोज़गारी तो जैसे कोई मसला ही नहीं है। मुल्क में नफ़रत की ऐसी आंधी चलाई जा रही है कि जैसे इसके बीच आकर हर चीज़ मिट जाएगी। अफ़सोस की बात यह है कि इस ख़तरनाक सूरत ए हाल पर क़ाबू पाने की बजाए सरकार में बैठे लोग इस मुल्क मुख़ालिफ़ आंधी को तूफ़ान में तब्दील करना चाहते हैं।*

*मुल्क का मुसलमान जो पिछले 75 साल से नफ़रत की आग में जल रहा है उसको राख के ढेर में तब्दील करके तूफ़ान में उड़ा देने की कोशिश की जा रही है। देश के 15 फ़ीसद मुसलामानों से 80 फ़ीसद हिन्दुओं को डराया जा रहा है। बहरहाल मुल्क में इस वक़्त जो सूरत ए हाल है वो किसी काली रात से कम नहीं है। मुमकिन है कि कुछ लोग फ़िरक़ापरस्ती के सबब अंधे हो गए हों, वो सुनहरी ख़्वाब देख रहे हों और उनको महसूस हो रहा हो कि शायद अच्छे दिन आने वाले हैं लेकिन मुल्क का एक बड़ा तब्क़ा इस बात के लिए फ़िक्र मंद है कि आख़िर देश किस रास्ते पर जा रहा है और इसका अंजाम क्या होगा?*

*हर रोज़ कोई न कोई ऐसा मसअला ज़ेर ए बहस लाया जा रहा है जो मुल्क में नफ़रत को और बढ़ाने का काम कर रहा है। अयोध्या में बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद ख़त्म हुआ तो ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही ईदगाह के मसअले को उठा दिया गया। बात तो इसपर होनी चाहिए थी कि मोदी सरकार ने अपनी 8 साला सरकार में क्या काम किया?  क्या जो वादे किये थे वो पूरे किये?  क्या देश में महंगाई कम हुई? बेरोज़गारी दूर हुई? काला धन वापस आया? गंगा जमुना जैसी नदियां साफ़ हुईं? आतंकवाद पर क़ाबू पाया जा सका?*

*लेकिन इस पर ख़ामोशी है। नौजवान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। ख़ुद मोदी सरकार की जानिब से संसद में पेश की गई रिपोर्ट है कि 2018 से 2020 के दौरान 9 हज़ार से भी ज़्यादा नौजवानों ने ख़ुदकुशी की है लेकिन इस पर कहीं कोई मुबाहिसा हुआ? दो साल से फ़ौज में भर्ती नहीं हुई और जब नौजवानों की तरफ़ से दबाव बनाया गया तो अग्निपथ जैसी विवादित योजना पेश कर दी गयी जिसने एक नया हंगामा खड़ा कर दिया। महज़ 22 साल की उम्र में नौजवानों को रिटायर्ड करने का मंसूबा तैयार करके मोदी सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है।*


*मुल्क की शानदार और आलमी शोहरत याफ़्ता विरासत को निशाना बनाया जा रहा है। ताजमहल और क़ुतुब मीनार के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू की जा रही है। हालांकि अब इलाहबाद हाईकोर्ट और पुरातत्व विभाग ने जो फिरकापरस्तों को आइना दिखाया है उससे कुछ उम्मीद बंधी है लेकिन सरकार में बैठे लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्यूंकि वो अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए कोई न कोई नया विषय छेड़ देते हैं।*

*अब गुस्ताख़ ए रसूल नूपुर शर्मा का ही मामला ले लीजिये। अगर सरकार की नियत अच्छी होती और मुल्क में शान्ति चाहती तो जैसे ही इस गुस्ताख़ के ख़िलाफ़ थानों में शिकायत दर्ज करायी गयी थी क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई कर दी जाती लेकिन ऐसा न करके इस मसले को हवा दी गयी। नतीजा क्या हुआ?  पूरे मुल्क में अफ़रा तफ़री मच गयी जिसका नुक़सान हक़ पर रहते हुए भी मुसलामानों का हुआ और हो रहा है।*

*नूपुर शर्मा तो जेल नहीं गईं लेकिन हक़ की आवाज़ बुलंद करने वाले 2200 से ज़्यादा लोगों को जेल में डाल दिया गया। उदयपुर में कन्हैया कुमार के क़त्ल ने तो जैसे आग में घी डालने का काम किया। हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स व ) के नाम पर क़त्ल को कोई भी जायज़ नहीं ठहरा रहा है। हम सबने सरकार से मांग की है कि मुजरिमीन को सख़्त से सख़्त सज़ा दी जाए लेकिन इसके बावजूद फिरकापरस्तों का जो तांडव है वो आप देख सकते हैं।*

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