पक्षपातपूर्ण और उपेक्षित नीति के कारण, दिल्ली में उर्दू और पंजाबी शिक्षकों का संकट: कलीमुल हफ़ीज़

नई दिल्ली (अनवार अहमद नूर) 2017 में जिस तरह से दिल्ली सरकार ने उर्दू और पंजाबी पर ज़ुल्म ढाया उसी प्रकार अब भी इसने उर्दू और पंजाबी भाषाओं के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया है। दोनों भाषाओं के शिक्षकों के रिक्त पदों के लिए विज्ञापन जारी किए गए, आवेदन भी मांगे गए, लेकिन  कुछ अनावश्यक शर्तें लगाकर  कुछ ही रिक्तियों को  भरा गया।

दिल्ली सरकार नहीं चाहती कि दोनों भाषाओं में रिक्तियां भरी जाएं। उक्त विचार कलीमुल हफ़ीज़, अध्यक्ष, मजलिस-ए-इत्तेहादुल -मुस्लिमीन, दिल्ली ने प्रकट किए हैं। उन्होंने कहा कि DSSB द्वारा 874 पंजाबी भाषा के पोस्ट प्रकाशित किए गए थे। लेकिन 66 पुरुष और 72 महिलाएं ही पास हुईं, जिससे 736 पद खाली रह गए। इसी तरह उर्दू भाषा के 917 पदों के लिए आवेदन मांगे गए थे, लेकिन केवल 177 उम्मीदवारों को ही सफल घोषित किया गया और 740 पद खाली रहे। 2017 की भर्ती में भी यही हुआ था पंजाबी में 214 रिक्तियों में से केवल 43 शिक्षकों से भरी हुई थीं और उर्दू के लिए 213 रिक्तियों के लिए केवल 34 उम्मीदवारों का चयन किया गया था। कलीमुल हफ़ीज़ ने कहा कि यह सब सरकार की गलत नीतियों का नतीजा है। इस भर्ती प्रक्रिया में उम्मीदवारों को दो पेपर हल करने होते हैं

एक में सामान्य प्रश्न  होते हैं जबकि दूसरे पेपर में अपने विषय से संबंधित प्रश्न  होते हैं।
लेकिन सामान्य विषय  में उर्दू और पंजाबी के अलावा अन्य विषयों के बारे में प्रश्न पूछे जाते हैं। जबकि विज्ञान, अंकगणित, भूगोल, इतिहास के सामान्य विषय के पेपर आदि  में 20 नंबर के प्रश्न  उम्मीदवार के अपने विषय  से संबंधित होते हैं। लेकिन यह सुविधा उर्दू और पंजाबी के लिए उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण उर्दू और पंजाबी के उम्मीदवार सामान्य प्रश्नपत्रों में आवश्यक अंक नहीं लाते हैं। सरकार को सभी विषयों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। विषय से जुड़े दूसरे प्रश्न पत्र  में भी सरकार ने ठगी की। पंजाबी और उर्दू भाषा के अभ्यर्थियों को भी हिंदी या अंग्रेजी में हल करने का आदेश  दिया गया था, जिससे अभ्यर्थी पास नहीं हो सके। सरकार को अपनी मंशा साफ करनी चाहिए। प्रश्न पत्र उस विषय की भाषा में दिया जाना चाहिए जिसके लिए शिक्षक नियुक्त किया जा रहा है। केजरीवाल सरकार भर्ती के नाम पर इन दो भाषाओं से खेल रही है। वह नहीं चाहती कि ये दोनों भाषाएं फलें-फूलें, वह नहीं चाहती कि बच्चे पंजाबी और उर्दू पढ़ें, इसलिए कम से कम लोगों को रखने के लिए जानबूझकर नीति बनाई गई है,कई उम्मीदवार बहुत कम नंबरों से  असफल हुए हैं।
हम मांग करते हैं कि नीति को ठीक किया जाये तथा दोनों प्रश्न पत्रों के नंबरों को जोड़ कर मेरिट बनाई जाए।
कलीमुल हफ़ीज़ ने कहा कि उर्दू और पंजाबी शिक्षकों का संकट पूर्वाग्रह और भेदभाव पर आधारित नीति के कारण पैदा हुआ है अगर जरूरत पड़ी तो कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।

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