संसद में मीडिया पर सेंसरशिप, यह लोकतंत्र है या तानाशाही-? अब पत्रकार उतरे सड़कों पर और पूछा सवाल।

प्रेस क्लब आफ इंडिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद पत्रकारों ने निकाला मार्च और कहा कि पत्रकारिता लोकतंत्र का अटूट हिस्सा है इस पर सेंसरशिप नहीं बर्दाश्त की जाएगी। 

नई दिल्ली (शांति मिशन न्यूज़ /अनवार अहमद नूर) आज प्रेस क्लब आफ इंडिया में खुद अपने ही उत्पीड़न के लिए पत्रकारों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। और वर्तमान सरकार पर खुला आरोप लगाया कि वह पत्रकारिता पर सेंसरशिप लगा रही है और संसद की कार्यवाही को जनता तक नहीं पहुंचने देने के लिए बाधाएं खड़ी कर रही है।यह सरासर तानाशाही है।

बताया गया कि पत्रकारों को संसद की कार्यवाही कवर करने के लिए आज संसद में घुसने नहीं दिया गया। इनका कहना है कि कोविड-19 और ऐसे बहानों से सरकार मीडिया पर प्रतिबंध लगा रही है। आखिर सरकार क्या छुपाना चाहती है जो पत्रकारों को संसद की बात लोगों तक नहीं पहुंचाने में बाधाएं खड़ी कर रही है। 
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के बाद पत्रकारों ने सड़क पर एक मार्च भी निकाला और लोगों के सामने और मीडिया प्रतिनिधियों से बात भी की। 

सड़क पर मार्च के दौरान पत्रकारों ने सरकार की आलोचना करते हुए अनेक विरोध वाले नारे लगाए और कहा कि मोदी सरकार होश में आओ, मीडिया पर सेंसरशिप न लगाओ। अनेक वरिष्ठ पत्रकारों ने जिनमें प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष उमाकांत लखेरा और सीनियर पत्रकार कुर्बान अली, सतीश जैकब आदि मौजूद थे ने आज एकजुट होकर सरकार के विरुद्ध अपना रोष प्रकट करते हुए कहा कि सरकार पत्रकारों पर और प्रेस पर सेंसरशिप लगा रही है जो प्रेस की आज़ादी पर हमला है वह कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

उमाकांत लखेड़ा ने कहा कि पत्रकारों को अपमानित किया जा रहा है। संसद और जनता के बीच दीवार खड़ी की जा रही है। संसद की कार्यवाही को पत्रकार जनता तक न पहुंचा सकें इसके लिए मोदी सरकार ने पत्रकारों पर सेंसरशिप लगाई है।लगभग 30 वर्षों से संसद को कवर कर रहे वरिष्‍ठ पत्रकार कुरबान अली ने कहा कि ऐसा तो एमरजेंसी में भी नहीं हुआ। संसद में जो हो रहा है सरकार उसे छुपाना क्यों चाहती है -?

वरिष्‍ठ पत्रकार सतीश जैकब का कहना था कि पत्रकारिता लोकतंत्र का अटूट हिस्सा है। मीडिया पर सेंसरशिप नहीं चलेगी।

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