किसान आंदोलन के आगे बेबस क्यों है सत्ताधारी दल


 भारत एक कृषि प्रधान देश है आजादी के बाद से कृषि सुधार की बात चलती रही है । किसान और खेती की बात की जाए तो यह बात ध्यान पूर्वक याद रखनी चाहिए कि प्रत्येक वर्ष हजारों किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाते हैं । किसानों की आत्महत्या के कारणों के बारे में बात की जाए तो इसमें मुख्यत: है , कर्ज में डूबे किसान, फसल का वाजिब दाम ना मिलना,प्राकृतिक आपदा में फसल बर्बाद हो जाना, यह मुख्य कारण है। किसानों को सब्सिडी अनुदान बीज व खाद पर रियायत की बात होती है । अमेरिका जैसे देश में किसानों को जितनी सब्सिडी मिलती है उसके मुकाबले में भारत कहीं भी नहीं ठहरता है । पिछले 10 सालों में किसान को मिलने वाला बीज, खाद, बिजली व डीजल के दामों में पर गौर करें तो इन सब चीजों के दाम में बढ़ोतरी हुई है। अब  इस बात का जायजा ले कि क्या किसान की फसल के दाम में भी इसी अनुपात में बढ़ोतरी हुई है?  इसका उत्तर आपको नहीं में मिलेगा । सीधी और सिंपल सी बात है कि किसान बहुत सारी समस्याओं में घिरा हुआ है। किसान की समस्याओं के समाधान के लिए अभी तक की सरकारों के प्रयास नाकाफी हैं। कोरोना काल में एनडीए की मोदी सरकार ने 3 बिल किसानों के लिए पास किए। जिन्हें लोकसभा और राज्यसभा में पास करके कानून भी बना दिया गया। सरकार कहती है कि यह तीनों कानून किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगा।जिससे किसानों की हालत ठीक हो जाएगी। किसानों को अपनी फसल कहीं भी बेचने का अधिकार मिल जाएगा। मंडियों में किसानों का शोषण होता है वह रुक जाएगा । किसानों को उनकी फसल का वाजिब दाम मिल जाएगा ,लेकिन किसान सरकार की बात से सहमत नहीं है। किसान 3 कानूनों को काला कानून बताता है और इस कानून में एमएसपी ना होने तथा भंडारण क्षमता पर रोक ना होने के कारण आशंकित है कि व्यापारी भंडारण करेगा  और किसान की फसल कम दाम पर खरीद कर मनमाने दाम पर बेचेगा। पहले से मजबूर किसान और अधिक मजबूर हो जाएगा। किसान को मिनिमम सपोर्ट प्राइस जब तक नहीं मिलेगा किसान आंदोलन्रत रहेगा। 

26 नवंबर 2020 को दिल्ली आ रहे हैं किसानों को सरकार ने सड़कों में गड्ढे खोदकर water Cannon और आंसू गैस का इस्तेमाल करके जिस तरह से रोकना चाहा वह दाव सरकार को उल्टा पड़ गया है। किसानों के अड़ियल रूख ने सरकार को किसानों से बातचीत करने को मजबूर कर दिया है। किसान इसे अपनी जीत मान रहे हैं। पिछले 6 साल के कार्यकाल को देखा जाए तो किसी भी आंदोलन से सरकार मजबूर नहीं हुई है। सीएए के खिलाफ देशभर में और शाहीन बाग के ऐतिहासिक आंदोलन के बाद भी सरकार ने बातचीत नहीं की।  अब तक सरकार अपनी शर्तों और हठधर्मिता पर अडिग रही है, लेकिन किसान आंदोलन को दिल्ली में न घुसने देने की सरकार की जिद ने उसे संकट में डाल दिया है। अब यदि सरकार कानून वापस लेती है तो यह उसके पूर्व के आचरण के विपरीत होगा। अगर सरकार किसानों की मांगें नहीं मानती है तो उनका आंदोलन अत्यधिक जोर पकड़ सकता है, जिससे सरकार और अधिक संकट में फंस जाएगी। किसान जिस तैयारी से आंदोलन में आए हैं और उनका जो दृढ़ निश्चय नजर आता है उसे देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार को किसानों की बात मान लेनी चाहिए।

 जिस प्रकार 3 दिसंबर 2020 की वार्तालाप में  किसान नेताओं ने सरकारी भोज का बहिष्कार किया है वह इस बात की ओर इशारा करता है कि किसान सड़कों पर गड्ढे ,वाटर कैनन ,आंसू गैस और सरकार की धमकी और डंडों से डरने वाला नहीं है। सत्ताधारी नेताओं के अहंकार को ठंडा करने का काम किसान कर चुके हैं। अब  जितना भी किसानों का आंदोलन लंबा खिंचेगा उससे सरकार पर दबाव ही बढ़ेगा। किसानों ने गेंद सरकार के पाले में डाल दी है अब देखना है कि सरकार क्या कदम उठाती है ।

प्रस्तुति : एस ए बेताब (संपादक बेताब समाचार एक्सप्रेस ) हिंदी मासिक पत्रिका एवं यूट्यूब चैनल

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